सनातन धर्म में माघ मास का विशेष महत्व माना गया है। यह मास तप, संयम, साधना और सौभाग्य से जुड़ा हुआ है। माघ माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला गौरी तृतीया व्रत स्त्रियों के लिए अत्यंत शुभ, पुण्यदायी और फलदायक माना गया है। यह व्रत विशेष रूप से अखंड सौभाग्य, सुखी वैवाहिक जीवन, मनोकामनाओं की पूर्ति और योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति से जुड़ा हुआ है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी तिथि को देवी गौरी (माता पार्वती) को भगवान शिव का वर प्राप्त हुआ था। यही कारण है कि यह व्रत विवाह, प्रेम, दांपत्य और पारिवारिक सुख का प्रतीक माना जाता है। कुंवारी कन्याएं इसे उत्तम वर की प्राप्ति के लिए करती हैं, जबकि विवाहित महिलाएं पति की दीर्घायु, वैवाहिक स्थिरता और सौभाग्य वृद्धि के लिए इस व्रत का पालन करती हैं।
गौरी तृतीया व्रत 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त
वर्ष 2026 में गौरी तृतीया व्रत 21 जनवरी 2026, बुधवार को रखा जाएगा।
तिथि विवरण इस प्रकार है:
- माघ शुक्ल तृतीया तिथि आरंभ: 20 जनवरी 2026, रात 01:43 बजे
- माघ शुक्ल तृतीया तिथि समाप्त: 21 जनवरी 2026, रात 01:48 बजे
उदयातिथि के अनुसार यह व्रत 21 जनवरी 2026 को ही मान्य होगा।
इस दिन के प्रमुख शुभ मुहूर्त
- ब्रह्म मुहूर्त: 05:27 से 06:20 तक
- विजय मुहूर्त: दोपहर 02:19 से 03:01 तक
- गोधूलि मुहूर्त: संध्या 05:49 से 06:15 तक
- रवि योग: दोपहर 01:58 से अगले दिन सुबह 07:14 तक
हालांकि इस दिन पंचक का प्रभाव भी रहेगा, लेकिन रवि योग की उपस्थिति इस व्रत को विशेष फलदायी बनाती है।
गौरी तृतीया व्रत का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
गौरी तृतीया को सौभाग्य का व्रत कहा जाता है। यह व्रत स्त्री जीवन के सबसे महत्वपूर्ण पक्ष, यानी विवाह और दांपत्य से जुड़ा हुआ है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि इस दिन देवी गौरी की पूजा करने से जीवन में प्रेम, विश्वास और स्थायित्व आता है।
माघ मास स्वयं तप और आत्मशुद्धि का प्रतीक है। इस मास में किए गए व्रत और दान का फल कई गुना बढ़ जाता है। शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को देवी शक्ति का विशेष प्रभाव माना गया है। इस दिन देवी गौरी और भगवान शिव की संयुक्त उपासना करने से गृहस्थ जीवन में संतुलन, समर्पण और प्रेम की प्राप्ति होती है।
गौरी तृतीया पूजा विधि
गौरी तृतीया की पूजा अत्यंत सरल लेकिन भावपूर्ण मानी गई है। इस व्रत की सफलता का आधार श्रद्धा, संयम और नियम है।
प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को शुद्ध करें और वहां देवी गौरी एवं भगवान शिव की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। व्रत का संकल्प लें और मन को एकाग्र करें।
पूजा के दौरान पुष्प, धूप, दीप, अक्षत, चंदन, फल, मिष्ठान अर्पित करें। देवी गौरी को विशेष रूप से श्रृंगार की वस्तुएं जैसे साड़ी, चूड़ी, बिंदी, कुमकुम आदि अर्पित की जाती हैं। भगवान शिव को बेलपत्र, भस्म और श्वेत पुष्प अर्पित करें।
इसके पश्चात गौरी तृतीया व्रत कथा का पाठ या श्रवण करें। अंत में देवी गौरी और भगवान शिव की संयुक्त आरती करें। कुछ स्थानों पर यह व्रत निर्जला भी रखा जाता है, हालांकि सामर्थ्य के अनुसार फलाहार किया जा सकता है।
गौरी तृतीया का पौराणिक महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। वर्षों की तपस्या, संयम और साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया।
इसी घटना की स्मृति में गौरी तृतीया का व्रत किया जाता है। यह व्रत इस बात का प्रतीक है कि सच्ची श्रद्धा, धैर्य और समर्पण से जीवन का सबसे बड़ा सुख प्राप्त किया जा सकता है। जिस प्रकार देवी पार्वती को शिव का साथ मिला, उसी प्रकार यह व्रत करने वाली स्त्रियों को भी जीवन में प्रेम, सम्मान और स्थायित्व की प्राप्ति होती है।
गौरी तृतीया व्रत का ज्योतिषीय प्रभाव
ज्योतिष शास्त्र में गौरी तृतीया व्रत को विवाह संबंधी दोषों की शांति के लिए अत्यंत प्रभावी माना गया है।
इस व्रत के प्रभाव से
- विवाह में हो रहा विलंब समाप्त होता है
- कुंडली के सप्तम भाव की पीड़ा शांत होती है
- मांगलिक दोष और मंगल के अशुभ प्रभाव कम होते हैं
- दांपत्य जीवन में चल रही कलह और तनाव दूर होता है
यदि पति-पत्नी के बीच मतभेद, अलगाव या भावनात्मक दूरी बन गई हो, तो गौरी तृतीया का व्रत संबंधों में पुनः मधुरता ला सकता है।
संतान सुख और वंश वृद्धि का योग
गौरी तृतीया व्रत केवल विवाह तक सीमित नहीं है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत के प्रभाव से संतान सुख और वंश वृद्धि का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है। जिन दंपतियों को संतान प्राप्ति में बाधा आ रही हो, उनके लिए यह व्रत विशेष फलदायी माना गया है।
गौरी तृतीया व्रत सनातन परंपरा में स्त्री शक्ति, प्रेम, तप और सौभाग्य का प्रतीक है। यह व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि श्रद्धा, विश्वास और दांपत्य संतुलन का माध्यम है। सच्चे मन, नियम और भक्ति के साथ किया गया गौरी तृतीया व्रत कभी निष्फल नहीं जाता।



