देश के प्रमुख उद्योगपति Anil Ambani ने सर्वोच्च न्यायालय में एक औपचारिक हलफनामा दायर कर यह आश्वासन दिया है कि वे अदालत की पूर्व अनुमति के बिना भारत नहीं छोड़ेंगे। यह हलफनामा उस जनहित याचिका के जवाब में दाखिल किया गया है, जो E. A. S. Sarma द्वारा दायर की गई थी।
मामला कथित तौर पर रिलायंस कम्युनिकेशंस (RCOM) और उसकी सहयोगी कंपनियों से जुड़े बड़े पैमाने के बैंक ऋण और फंड दुरुपयोग के आरोपों से संबंधित है।
अदालत में दिया गया आश्वासन
4 फरवरी को हुई सुनवाई के दौरान अंबानी के वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह बयान दर्ज कराया था कि अंबानी अदालत की अनुमति के बिना विदेश यात्रा नहीं करेंगे। अब इस आश्वासन को औपचारिक हलफनामे के रूप में रिकॉर्ड पर रखा गया है।
हलफनामे में अंबानी ने स्पष्ट किया है कि जुलाई 2025 से वे भारत से बाहर नहीं गए हैं और फिलहाल विदेश जाने की कोई योजना नहीं है। यदि भविष्य में यात्रा की आवश्यकता पड़ती है, तो वे पहले अदालत से अनुमति लेंगे।
जांच एजेंसियों के साथ सहयोग
अंबानी इस समय Enforcement Directorate (ED) और Central Bureau of Investigation (CBI) की जांच के दायरे में हैं। हलफनामे में उन्होंने आश्वासन दिया है कि वे जांच एजेंसियों के साथ पूर्ण सहयोग कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे।
यह भी उल्लेख किया गया है कि धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA) की धारा 50 के तहत उनकी जांच जारी है। ED द्वारा भेजे गए समन के जवाब में वे निर्धारित तिथि पर उपस्थित होने का आश्वासन दे चुके हैं।
31,580 करोड़ रुपये के कथित फ्रॉड का आरोप
याचिका के अनुसार, RCOM और उसकी सहायक कंपनियों रिलायंस इन्फ्राटेल तथा रिलायंस टेलीकॉम ने 2013 से 2017 के बीच State Bank of India (SBI) के नेतृत्व वाले बैंकों के कंसोर्टियम से 31,580 करोड़ रुपये का ऋण लिया था।
याचिका में दावा किया गया है कि SBI द्वारा कराए गए फोरेंसिक ऑडिट में बड़े पैमाने पर फंड डायवर्जन और दुरुपयोग के संकेत मिले। आरोपों के अनुसार, हजारों करोड़ रुपये असंबंधित ऋणों के भुगतान, संबंधित पक्षों को हस्तांतरण, म्यूचुअल फंड और फिक्स्ड डिपॉजिट में निवेश तथा जटिल सर्कुलर रूटिंग के माध्यम से उपयोग किए गए।
यह ध्यान देने योग्य है कि ये आरोप हैं, जिनकी सत्यता का अंतिम निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।
SIT जांच और न्यायिक निगरानी
याचिकाकर्ता का तर्क है कि CBI और ED की मौजूदा कार्यवाही कथित अनियमितताओं के केवल एक हिस्से को कवर करती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बैंक अधिकारियों और नियामकों की संभावित भूमिका की पर्याप्त जांच नहीं की जा रही है।
4 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने ED को आरोपों की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) गठित करने का निर्देश दिया। साथ ही CBI को भी यह सुनिश्चित करने को कहा गया कि बैंक अधिकारियों की किसी भी संभावित मिलीभगत की जांच की जाए।
यह आदेश इस मामले को केवल कॉर्पोरेट विवाद से आगे बढ़ाकर सार्वजनिक धन और बैंकिंग प्रणाली की पारदर्शिता से जुड़ा मुद्दा बना देता है।
व्यापक प्रभाव और संभावित परिणाम
यदि जांच में आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह मामला भारत की बैंकिंग और कॉर्पोरेट गवर्नेंस प्रणाली पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। दूसरी ओर, यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो यह भी न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता का उदाहरण होगा।
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से जुड़े बड़े ऋण मामलों में न्यायिक निगरानी की मांग यह दर्शाती है कि जनता और निवेशकों का भरोसा बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है।
अनिल अंबानी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दिया गया हलफनामा जांच प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण चरण है। विदेश न जाने और जांच में सहयोग का आश्वासन अदालत के समक्ष उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
आगे की दिशा अब जांच एजेंसियों और न्यायालय की कार्यवाही पर निर्भर करेगी। यह मामला केवल एक कारोबारी विवाद नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन, बैंकिंग पारदर्शिता और कॉर्पोरेट उत्तरदायित्व से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुका है।




