हाल ही में किए गए एक शोध में पता चला है कि हीलियम-3 (Helium-3), जो एक दुर्लभ समस्थानिक (isotope) है और प्रारंभिक सौर प्रणाली के दौरान बना था, पृथ्वी के ठोस कोर में बंद हो सकता है। यह खोज पृथ्वी के निर्माण की गति और प्रक्रिया को समझने में मदद कर सकती है।
हीलियम-4 की तुलना में, जो मुख्य रूप से रेडियोधर्मी क्षय (radioactive decay) से उत्पन्न होता है, हीलियम-3 प्रारंभिक गैसीय बादल (primordial gas cloud) से आया है जिसने पूरे सौरमंडल को आकार दिया था।
हालांकि, इस समस्थानिक के निशान ज्वालामुखीय हॉटस्पॉट और समुद्र तल के मध्य रिज (mid-ocean ridges) में पहले भी पाए गए हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि यह अरबों वर्षों तक पृथ्वी के अंदर कैसे बना रहा।
चूंकि हीलियम एक अत्यधिक वाष्पशील तत्व है, वैज्ञानिकों का मानना था कि यह पृथ्वी की मेंटल (mantle) से बाहर निकल जाएगा, विशेष रूप से उस समय जब चंद्रमा के निर्माण के लिए एक विशाल टक्कर (giant impact) हुई थी।
क्या पृथ्वी के कोर में हीलियम-3 वास्तव में मौजूद है?
Physical Review Letters में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, टोक्यो विश्वविद्यालय (University of Tokyo) के शोधकर्ताओं ने यह जांचने की कोशिश की कि क्या हीलियम पृथ्वी के कोर में मौजूद लोहे (Iron) के साथ मिल सकता है। इस प्रयोग का नेतृत्व वैज्ञानिक केई हीरोसे (Kei Hirose) कर रहे थे।
वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन के लिए हीरा-टिप्पड़ एनविल (diamond-tipped anvil) का उपयोग किया, जिससे उन्होंने लोहे और हीलियम को पृथ्वी के कोर की स्थितियों के समान अत्यधिक दबाव (pressure) में रखा।
प्रयोग के दौरान 50,000 से 550,000 गुना वायुमंडलीय दबाव उत्पन्न किया गया, जो पृथ्वी की सतह पर सामान्य दबाव से लाखों गुना अधिक है।
इसके अलावा, इन नमूनों को 727°C से 2,727°C तक गरम किया गया और फिर दबाव कम कर दिया गया। फिर, अत्यधिक ठंडे तापमान (cryogenic temperatures) पर इनका विश्लेषण किया गया ताकि हीलियम बाहर न निकल पाए।
इस शोध में पाया गया कि ठोस लोहे में लगभग 3.3% तक हीलियम समाहित हो सकता है, जिससे यह संभावना बढ़ जाती है कि पृथ्वी के कोर में हीलियम-3 फंसा रह सकता है।
क्या इससे पृथ्वी के निर्माण का रहस्य उजागर होगा?
न्यू मैक्सिको विश्वविद्यालय (University of New Mexico) के भूभौतिक विज्ञानी पीटर ओल्सन (Peter Olson) ने कहा कि यह अध्ययन इस बात की पुष्टि करता है कि हीलियम पृथ्वी के ठोस कोर के साथ संगत हो सकता है।
हालांकि, उन्होंने यह भी बताया कि पृथ्वी के कोर का केवल 4% भाग ठोस है, जबकि बाकी कोर तरल अवस्था (liquid state) में है।
इसलिए, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि हीलियम-3 तरल कोर में भी उसी तरह से सुरक्षित रह सकता है या नहीं।
इसके अलावा, ओल्सन ने यह भी बताया कि इस खोज से पृथ्वी के निर्माण की समयसीमा (Earth’s formation timeline) का भी निर्धारण किया जा सकता है।
- यदि हीलियम-3 पृथ्वी के कोर में मौजूद है, तो यह दर्शाता है कि पृथ्वी का निर्माण बहुत तेजी से, कुछ ही मिलियन वर्षों में हुआ होगा।
- यदि पृथ्वी का निर्माण धीमी गति से (100 मिलियन वर्षों में) हुआ होता, तो हीलियम-3 का अधिकांश भाग नष्ट हो जाता या अंतरिक्ष में लुप्त हो जाता।
इस खोज के संभावित प्रभाव
- पृथ्वी की उत्पत्ति को समझने में मदद: यदि हीलियम-3 पृथ्वी के कोर में पाया जाता है, तो यह पृथ्वी के निर्माण की प्रक्रिया और उसकी समयसीमा को समझने में एक महत्वपूर्ण कड़ी हो सकता है।
- भूवैज्ञानिक घटनाओं का विश्लेषण: यह शोध यह भी समझने में मदद कर सकता है कि पृथ्वी की गहरी आंतरिक परतों में कौन-कौन से तत्व फंसे हो सकते हैं और वे कैसे बरकरार रहते हैं।
- खगोल भौतिकी में योगदान: हीलियम-3 जैसे तत्वों के अध्ययन से खगोल भौतिकी में भी नई जानकारियाँ मिल सकती हैं, खासकर ग्रहों की उत्पत्ति और प्रारंभिक ब्रह्मांड में घटित घटनाओं के बारे में।
- ऊर्जा स्रोत के रूप में संभावनाएँ: हीलियम-3 का उपयोग संभावित फ्यूजन ऊर्जा (fusion energy) स्रोत के रूप में किया जा सकता है। यदि पृथ्वी के कोर में हीलियम-3 की प्रचुर मात्रा मौजूद है, तो भविष्य में यह ऊर्जा उत्पादन के लिए एक क्रांतिकारी खोज साबित हो सकता है।
इस शोध ने यह दिखाया है कि पृथ्वी के ठोस कोर में हीलियम-3 फंसा हो सकता है, जिससे वैज्ञानिकों को हमारे ग्रह के निर्माण के बारे में नई जानकारियाँ मिल सकती हैं।
हालांकि, अभी और अधिक शोध की आवश्यकता है, खासकर यह जानने के लिए कि क्या यह समस्थानिक पृथ्वी के तरल कोर में भी सुरक्षित रह सकता है। यदि यह सिद्ध होता है, तो यह हमारे ब्रह्मांड की प्रारंभिक स्थितियों को समझने में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी।



