भारतीय पौराणिक परंपरा में नदियों को केवल जलधारा नहीं, बल्कि जीवनदायिनी मातृशक्ति के रूप में देखा गया है। ऐसी ही एक पवित्र और महान नदी हैं मां कावेरी, जिनका उद्गम केवल भौगोलिक घटना नहीं, बल्कि एक गहन धार्मिक, आध्यात्मिक और मानवीय करुणा से जुड़ी कथा है। कावेरी नदी की उत्पत्ति से जुड़ी यह कथा हमें यह समझाती है कि जब संपूर्ण सृष्टि संकट में होती है, तब देवता स्वयं मानव कल्याण के लिए हस्तक्षेप करते हैं।
एक समय की बात है, जब जम्बूद्वीप के अनेक क्षेत्रों में भयानक सूखा पड़ गया। जल के अभाव में नदियां सूखने लगीं, धरती बंजर हो गई और मनुष्य, पशु तथा पक्षी सभी जीवन संकट से जूझने लगे। जल के बिना जीवन असंभव हो चला था। सृष्टि पर यह संकट केवल मानव तक सीमित नहीं था, बल्कि वनस्पतियां, जीव-जंतु और समूचा प्राकृतिक संतुलन डगमगा गया था। इस विकट स्थिति को देखकर ऋषि-मुनि और देवता सभी अत्यंत व्यथित हो उठे।
इस भयावह स्थिति को देखकर महर्षि अगस्त्य के मन में गहरी चिंता उत्पन्न हुई। वे एक महान तपस्वी थे और मानव जाति के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहते थे। उन्होंने यह भली-भांति समझ लिया कि यदि शीघ्र समाधान नहीं हुआ, तो जम्बूद्वीप का दक्षिणी भूभाग पूर्णतः जनविहीन और वनस्पतिविहीन हो जाएगा। इसी चिंता के साथ उन्होंने मानव जाति की रक्षा का प्रण लिया और सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे।
अगस्त्य मुनि ने ब्रह्मा जी से विनम्र किंतु व्याकुल स्वर में कहा कि पृथ्वी पर जो संकट आया है, वैसा संकट उन्होंने पहले कभी नहीं देखा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि शीघ्र उपाय नहीं किया गया, तो सृष्टि का संतुलन नष्ट हो जाएगा। अगस्त्य की करुणा और सृष्टि के प्रति उनकी चिंता देखकर ब्रह्मा जी भी गंभीर हो गए।
ब्रह्मा जी ने कहा कि वे इस संकट को भली-भांति समझते हैं और अगस्त्य मुनि की चिंता से प्रसन्न भी हैं, किंतु इस समस्या का समाधान अत्यंत कठिन है। उन्होंने कहा कि यदि कोई इस कार्य को कर सकता है, तो वही उपाय संभव है। अगस्त्य मुनि ने बिना किसी संकोच के कहा कि सृष्टि की रक्षा के लिए वे हर प्रकार का कष्ट सहने को तैयार हैं।
तब ब्रह्मा जी ने रहस्य प्रकट किया कि यदि कैलास पर्वत से कावेरी नदी को भारत भूमि के दक्षिण भाग में लाया जाए, तो इस संकट का समाधान संभव है। यह कार्य अत्यंत दुष्कर था, किंतु ब्रह्मा जी ने इसे सरल बनाते हुए कहा कि पूरी नदी लाने की आवश्यकता नहीं है। केवल कैलास पर्वत की थोड़ी-सी बर्फ या हिम को अपने कमंडल में भरकर दक्षिण दिशा में ले जाना होगा। उसी हिमजल से कावेरी स्वयं प्रकट हो जाएंगी।
अगस्त्य मुनि तुरंत कैलास पर्वत की ओर प्रस्थान कर गए। अपने तपोबल से वे शीघ्र ही कैलास पहुंचे और वहां की पवित्र हिम को अपने कमंडल में भर लिया। इसके बाद वे उस स्थान की खोज में निकल पड़े, जहां कावेरी का उचित उद्गम हो सके। वे दक्षिण दिशा की ओर बढ़ते चले गए, किंतु मार्ग में उन्हें यह ध्यान आया कि उन्होंने ब्रह्मा जी से यह पूछना ही भूल गए कि हिमजल को कहां और कैसे प्रवाहित करना है।
उद्गम स्थल की खोज करते-करते वे वर्तमान कुर्ग क्षेत्र में पहुंचे। लंबी यात्रा और मानसिक चिंता के कारण ऋषि अत्यंत थक चुके थे। उन्होंने पश्चिमी घाट के उत्तरी भाग में स्थित ब्रह्मकपाल पर्वत को देखा, जिसके एक कोने में एक सुंदर और शांत जलाशय था। उन्हें यह स्थान विश्राम के लिए उपयुक्त लगा। उन्होंने अपना कमंडल भूमि पर रखा और कुछ समय विश्राम करने लगे।
मनोरम वातावरण और थकान के कारण अगस्त्य मुनि को झपकी आ गई। कुछ ही देर में एक हल्की-सी आहट से उनकी तंद्रा भंग हुई। जब उन्होंने आंखें खोलीं, तो देखा कि उनका कमंडल भूमि पर लुढ़क चुका है और उसमें भरा हुआ पवित्र जल बहने लगा है। पास ही एक कौआ बैठा दिखाई दिया।
पहली दृष्टि में अगस्त्य मुनि को लगा कि कौए ने जल की अभिलाषा में कमंडल को गिरा दिया है। उन्होंने यह सोचकर अत्यंत क्रोध अनुभव किया कि उनके कठोर तप, श्रम और मानव जाति की रक्षा का प्रयास व्यर्थ हो गया। वे कौए को दंड देने के लिए आगे बढ़े ही थे कि तभी अद्भुत घटना घटी।
अचानक वह कौआ दिव्य प्रकाश में परिवर्तित होकर भगवान गणेश के रूप में प्रकट हो गया। यह दृश्य देखकर अगस्त्य मुनि तुरंत नतमस्तक हो गए। तब भगवान गणेश ने उन्हें बताया कि वे उनकी परोपकार की भावना से अत्यंत प्रभावित हैं। मानव जाति को संकट से बचाने के लिए अगस्त्य का प्रयास देखकर वे स्वयं उनकी सहायता के लिए कौए का रूप धारण कर आए थे।
गणेशजी ने कहा कि यदि उद्गम स्थल की खोज में विलंब होता, तो मानव जाति को और अधिक कष्ट सहना पड़ता। इसलिए उन्होंने स्वयं यह व्यवस्था की कि कमंडल का जल वहीं प्रवाहित हो जाए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यही कावेरी का उचित और पवित्र उद्गम स्थल है। इतना कहकर भगवान गणेश अंतर्धान हो गए।
उधर, जैसे ही कमंडल का जल एकत्र होकर बहने लगा, कावेरी नदी की मधुर कलकल ध्वनि गूंज उठी। जहां जल पहले एकत्र हुआ, वहां एक तालाब जैसा स्वरूप बन गया और वहीं से कावेरी नदी का प्रवाह प्रारंभ हुआ। यह दृश्य देखकर अगस्त्य मुनि का हृदय आनंद से भर गया और उनकी सारी थकान समाप्त हो गई।
इस प्रकार ब्रह्मकपाल पर्वत से प्रवाहित होकर कावेरी नदी दक्षिण भारत की जीवनरेखा बनी। यह कथा न केवल कावेरी के उद्गम की व्याख्या करती है, बल्कि यह भी सिखाती है कि सच्ची नीयत, परोपकार और मानव कल्याण के लिए किए गए प्रयासों में स्वयं देवता सहायता के लिए आगे आते हैं।



