नमस्कार मित्रों,
एक छोटे से गाँव में एक मासूम बालक रहता था, जो लगभग दस साल से अखबार बेचकर अपना और अपनी बीमार माँ का पेट पाल रहा था। एक दिन, जब अखबार नहीं छपा, तो उसने एक नया तरीका सोचा। वह एक बड़े से मकान के गेट पर पहुंचा और घंटी बजाई।
मालकिन ने दरवाजा खोला और पूछा, “क्या है?”
बालक ने विनम्रता से कहा, “आंटी जी, क्या मैं आपका गार्डन साफ कर दूं?”
मालकिन ने मना कर दिया, “नहीं, हमें नहीं करवाना।”
लेकिन बालक ने हाथ जोड़कर दयनीय स्वर में कहा, “प्लीज आंटी जी, करा लीजिए न, अच्छे से साफ करूंगा।”
मालकिन का दिल पसीज गया, और उसने कहा, “अच्छा ठीक है, कितने पैसे लेगा?”
बालक ने जवाब दिया, “पैसा नहीं आंटी जी, खाना दे देना।”
मालकिन ने सोचा कि बेचारा भूखा होगा, और उसने कहा, “ऐ लड़के, पहले खाना खा ले, फिर काम करना।”
लेकिन बालक ने जवाब दिया, “नहीं आंटी जी, पहले काम कर लूँ, फिर आप खाना दे देना।”
मालकिन ने उसकी दृढ़ता को देखकर हामी भर दी और अपने काम में लग गई।
एक घंटे बाद, बालक ने मालकिन को बुलाया और कहा, “आंटी जी, देख लीजिए, सफाई अच्छे से हुई कि नहीं।”
मालकिन ने देखा कि बालक ने बहुत बढ़िया सफाई की थी। गमले भी करीने से जमा दिए थे। उसने कहा, “अरे वाह! तूने तो बहुत बढ़िया सफाई की है। यहां बैठ, मैं खाना लाती हूँ।”
जैसे ही मालकिन ने उसे खाना दिया, बालक ने जेब से पन्नी निकाली और उसमें खाना रखने लगा।
मालकिन ने पूछा, “भूखे काम किया है, अब खाना तो यहीं बैठकर खा ले। जरूरत होगी तो और दे दूंगी।”
बालक ने जवाब दिया, “नहीं आंटी, मेरी बीमार माँ घर पर है। सरकारी अस्पताल से दवा तो मिल गयी है, पर डॉक्टर साहब ने कहा है कि दवा खाली पेट नहीं खाना है।”
मालकिन का दिल द्रवित हो गया। वह रो पड़ी और अपने हाथों से मासूम को खाना खिलाया। फिर उसने उसकी माँ के लिए रोटियां बनाईं और साथ उसके घर जाकर उसकी माँ को रोटियां दे आई।
यह कहानी हमें सिखाती है कि छोटे-छोटे कर्मों से भी बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। बालक की दृढ़ता और मालकिन की दया ने न केवल उस दिन उस बालक और उसकी माँ की मदद की, बल्कि यह हमें यह भी याद दिलाती है कि हमें हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहना चाहिए।
लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद मित्रों.
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