|| मन का खेल ||

नमस्कार मित्रों,

गर्मी का मौसम था। मैं अपने काम से घर से बाहर निकला। काम निपटाकर जब वापस लौटने लगा, तो गर्मी बहुत बढ़ गई थी। मुझे सामने एक शीशम का पेड़ दिखा। मैंने सोचा, थोड़ी देर इस पेड़ की छाँव में बैठ जाऊँ और अपना पसीना सुखा लूं।

मैं पेड़ के नीचे जाकर खड़ा हो गया। तभी सामने वाले घर की खिड़की खुली और एक आदमी ने मुझसे पूछा, “पानी पियोगे?” मुझे बहुत ज़ोरों की प्यास लगी थी। मैंने हाँ कह दिया।

हम दोनों में से कोई बोला नहीं था। बस इशारों में ही बात हुई थी। मैं सोचने लगा, कितना अच्छा आदमी है। न जान, न पहचान, फिर भी उसे कैसे पता चला कि मुझे प्यास लग रही होगी? बहुत संवेदनशील आदमी है।

मैं वहीं खड़ा रहा। 5 मिनट हो गए, 7 मिनट हो गए, 10 मिनट हो गए, लेकिन वह आया ही नहीं। मैंने मन में सोचा, यह क्या बात हुई? पानी पिलाना ही नहीं था, तो पूछा क्यों? और यहाँ खड़ा क्यों कर दिया? मैं इतनी देर यहाँ खड़ा तो नहीं रहता, अपने घर चला जाता। कैसा कठोर दिल है!! मेरे मन में उसके प्रति बुरे-बुरे विचार आ रहे थे।

तभी सामने का गेट खुला। वह आदमी हाथ में जग लेकर आ रहा था। उसने कहा, “भाई साहब, माफ करना। मैंने सोचा, कोरा पानी क्या पिलाऊं, गर्मी बहुत तेज़ है, इसलिए शिकंजी बनाने लग गया। मैं आपके लिए शिकंजी लाया हूँ।”

मेरे विचारों के प्रवाह की दिशा फिर बदल गई। मैं सोचने लगा, कितना बड़ा दिल है इसका! मैं ही गलत सोच रहा था। उसने गिलास में शिकंजी डाल दी। जैसे ही गिलास मुँह से लगाई, उसमें मीठा तो था ही नहीं। फिर सोचा, अच्छा बेवकूफ़ बनाया इस आदमी ने। शिकंजी बनाई वो भी फीकी, शिकंजी में शक्कर नहीं डाल कर लाया। ऐसी शिकंजी किस काम की? इससे तो पानी ही ले आता!! एक ही पल में विचारों के काफ़िले ने दिशा बदल दी।

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तभी उसने अपने जेब में से पुड़िया निकाली और बोला, “भाई साहब, मैंने सोचा पता नहीं कितनी चीनी पसंद हो और कहीं आप चीनी लेते भी हो या नहीं! इसलिए मैं चीनी अलग से ले आया हूँ।”

मैं फिर सोचने लग गया कि आदमी तो बहुत अच्छा है। यह तो है मन का खेल, जो हमारा मन हर पल हम पर खेल रहा है!

हमारी राय इतनी जल्दी-जल्दी बदलती है कि हम परिस्थितियों को पूरी तरह से समझे बिना ही अपनी धारणा बना लेते हैं। वास्तव में हमारे मन में उठने वाले विचारों का प्रवाह बाहरी परिस्थितियों से ज़्यादा भीतर की दशा से प्रभावित होकर, बाहर सही और गलत के धागों का एक जाल अपने चारों ओर बुनता जाता है…और हम प्रतिक्रिया के रूप में हर पल उसमें उलझते जा रहे हैं…और हम बन गए मन के खेल के शिकार… मन के गुलाम!!

“मन को स्थिर और शान्त करने में ही सारे सुखों का रहस्य छिपा हुआ है।”

यह कहानी आपको कैसी लगी? कमेंट करके जरूर बताएं और इस ज्ञान को अपने दोस्तों और परिवार के साथ साझा करें ताकि वे भी मन के खेल को समझ सकें।

लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद मित्रों.

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