एक नए अध्ययन में पता चला है कि पृथ्वी के झुकाव (Earth’s tilt) और कक्षा (orbit) में बदलावों ने पिछले 8 लाख वर्षों में बर्फ युगों (Ice Ages) की शुरुआत और समाप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि यदि ग्रीनहाउस गैसों (Greenhouse Gases) का प्रभाव न होता, तो अगले 11,000 वर्षों में एक और हिम युग शुरू हो सकता था।
अध्ययन के अनुसार, पृथ्वी की धुरी (axial tilt) और कक्षा में परिवर्तन लंबे समय तक जलवायु पैटर्न (climate patterns) को प्रभावित करते हैं और बर्फीली चादरों (ice sheets) के विस्तार व संकुचन से गहराई से जुड़े होते हैं।
पृथ्वी के झुकाव और घूर्णन (Wobble) का जलवायु पर प्रभाव
Science पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, वर्तमान में पृथ्वी की धुरी 23.5 डिग्री के कोण पर झुकी हुई है।
- यह झुकाव हर 41,000 वर्षों में बदलता रहता है, जिससे ध्रुवों (poles) तक पहुंचने वाली सौर ऊर्जा की मात्रा प्रभावित होती है।
- पृथ्वी की धुरी में कंपन (precession या wobble) भी एक महत्वपूर्ण कारक है, जो 21,000 वर्षों के चक्र में सूर्य के प्रकाश की तीव्रता को बदलता है।
दोनों परिवर्तन बर्फ युगों की समय-सीमा (timing) निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
Cardiff University के प्रोफेसर स्टीफन बार्कर (Stephen Barker) ने Live Science को दिए इंटरव्यू में बताया कि
“पृथ्वी के झुकाव, घूर्णन और बर्फीली चादरों की गति के बीच अद्भुत सहसंबंध (correlation) पाया गया है।”
शोधकर्ताओं ने महासागरीय अवसाद (ocean sediment) में फोरामिनिफेरा (forams) नामक सूक्ष्म जीवों के अवशेषों का अध्ययन किया। इन अवशेषों से पता चला कि पृथ्वी पर बर्फ युगों के दौरान बर्फीली चादरों का विस्तार और संकुचन कैसे हुआ।
अध्ययन में अनुमान लगाया गया कि यदि मानव गतिविधियों का हस्तक्षेप नहीं होता, तो:
- अगले 10,000 से 11,000 वर्षों में बर्फ की चादरें बढ़नी शुरू हो जातीं।
- यह विस्तार 80,000 से 90,000 वर्षों तक अपने चरम पर पहुंचता।
- इसके बाद, यह धीरे-धीरे पिघलकर वापस सागर में समा जाता।
लेकिन मानव निर्मित कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जन के कारण यह चक्र बाधित हो गया है।
प्रोफेसर बार्कर के अनुसार,
“यदि CO₂ का स्तर लगातार उच्च बना रहता है, तो पृथ्वी पर एक और हिम युग आने की संभावना खत्म हो सकती है।”
क्या पृथ्वी पर अब कभी नहीं आएगा बर्फ युग?
इस शोध के अनुसार, यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं किया गया, तो पृथ्वी एक और हिम युग (glacial period) को अनुभव नहीं कर पाएगी।
यह निष्कर्ष जलवायु परिवर्तन (climate change) की दिशा और भविष्य के अनुमानों के लिए महत्वपूर्ण है।
शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन को पृथ्वी की दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन प्रक्रिया को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बताया है।
इससे यह भी स्पष्ट होता है कि मानव गतिविधियाँ अब प्राकृतिक जलवायु चक्रों को प्रभावित कर रही हैं।
इस खोज के संभावित प्रभाव:
- भविष्य में जलवायु पूर्वानुमान में सुधार: पृथ्वी के झुकाव और कक्षा के बदलावों के प्रभाव को समझने से लंबी अवधि के जलवायु परिवर्तनों की सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है।
- ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव का निर्धारण: यह शोध दिखाता है कि मानव गतिविधियों ने पृथ्वी की प्राकृतिक हिम युग चक्र को कैसे प्रभावित किया है।
- बर्फीली चादरों का अध्ययन: ग्लेशियरों और बर्फ की चादरों के व्यवहार को समझने में यह अध्ययन मदद कर सकता है।
- जलवायु परिवर्तन की नीति निर्माण: नीति-निर्माताओं को यह समझने में सहायता मिलेगी कि कार्बन उत्सर्जन में कटौती कितनी आवश्यक है।
- भूगर्भीय इतिहास की बेहतर समझ: महासागरीय अवसादों और बर्फ की चादरों के विस्तार के अध्ययन से वैज्ञानिक पृथ्वी के भूगर्भीय इतिहास को और बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।
अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि पृथ्वी के झुकाव और कक्षा में परिवर्तन अतीत में हिम युगों के आने-जाने का प्रमुख कारण रहे हैं। लेकिन ग्रीनहाउस गैसों के उच्च स्तर के कारण अब यह प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित हो सकती है।
यदि CO₂ उत्सर्जन कम नहीं किया जाता, तो अगले 10,000 वर्षों में संभावित बर्फ युग की संभावना समाप्त हो सकती है। यह खोज इस बात की पुष्टि करती है कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन अब पृथ्वी के दीर्घकालिक जलवायु चक्रों को भी बदल रहा है।



