भारतीय संत परंपरा में कई महान संत हुए हैं जिन्होंने समाज को आध्यात्मिकता, समानता और मानवता का मार्ग दिखाया। महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा में ऐसे ही एक महान संत हैं संत एकनाथ महाराज। उनके जीवन और शिक्षाओं का प्रभाव केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे भारतीय समाज पर पड़ा।
हर वर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को संत एकनाथ महाराज की पुण्य स्मृति में संत एकनाथ षष्ठी मनाई जाती है। यह दिन उनके जीवन, उनके आध्यात्मिक संदेश और उनके सामाजिक सुधारों को स्मरण करने का अवसर होता है।
वर्ष 2026 में संत एकनाथ षष्ठी का पर्व 9 मार्च को मनाया जाएगा। इस दिन महाराष्ट्र के पैठण सहित कई स्थानों पर भक्ति कार्यक्रम, कीर्तन, भजन और धार्मिक आयोजन होते हैं। लाखों श्रद्धालु इस अवसर पर संत एकनाथ महाराज को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
संत एकनाथ महाराज का जीवन परिचय
संत एकनाथ महाराज का जन्म 1533 ईस्वी में महाराष्ट्र के पैठण नगर में हुआ था। वे महान संत, कवि, दार्शनिक और समाज सुधारक थे।
उनका जीवन भक्ति, ज्ञान और समाज सेवा का अद्भुत संगम था। उन्होंने भगवान विट्ठल की भक्ति को जन-जन तक पहुंचाया और समाज में समानता तथा करुणा का संदेश दिया।
संत एकनाथ महाराज ने लगभग 72 वर्ष का जीवन व्यतीत किया और अपने जीवन के अंतिम समय में फाल्गुन कृष्ण षष्ठी के दिन गोदावरी नदी में जल समाधि लेकर इस संसार से विदा ली।
मान्यता है कि उन्होंने विट्ठल का नाम जपते हुए गोदावरी नदी में प्रवेश किया और सदेह जल समाधि प्राप्त की। इसी कारण यह दिन उनकी पुण्य तिथि के रूप में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
संत एकनाथ षष्ठी का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व
संत एकनाथ षष्ठी का महत्व केवल उनकी पुण्य तिथि होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दिन उनके द्वारा दिए गए आध्यात्मिक और सामाजिक संदेशों को याद करने का अवसर भी है।
संत एकनाथ महाराज ने अपने जीवन में जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता का खुलकर विरोध किया। उस समय समाज में छुआछूत और जाति व्यवस्था का गहरा प्रभाव था, लेकिन संत एकनाथ ने इन रूढ़ियों को चुनौती दी।
उन्होंने अछूत माने जाने वाले लोगों के घर जाकर भोजन किया और उन्हें समाज का समान सदस्य माना।
उनकी करुणा और दया का एक प्रसिद्ध उदाहरण यह भी है कि उन्होंने एक प्यासे गधे को गंगा का पवित्र जल पिलाया। इस घटना के माध्यम से उन्होंने यह संदेश दिया कि सभी जीवों के प्रति दया ही सच्ची भक्ति है।
उनका यह सिद्धांत भूतदया के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जिसका अर्थ है सभी जीवों के प्रति करुणा और प्रेम।
पैठण में नाथ षष्ठी महोत्सव
संत एकनाथ षष्ठी के अवसर पर महाराष्ट्र के पैठण नगर में भव्य उत्सव आयोजित किया जाता है जिसे नाथ षष्ठी महोत्सव कहा जाता है।
यह महोत्सव सामान्यतः तीन दिनों तक चलता है और इसमें लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं।
पहले दिन को कावड़ दिवस कहा जाता है। इस दिन महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों से वारकरी परंपरा के भक्त गोदावरी नदी का पवित्र जल लेकर पैठण पहुंचते हैं।
दूसरे दिन, जो मुख्य दिवस होता है, संत एकनाथ महाराज की पादुकाओं की पूजा की जाती है और भव्य पालकी यात्रा निकाली जाती है। श्रद्धालु गोदावरी नदी में स्नान करते हैं और संत के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
तीसरे दिन इस उत्सव का समापन “काला” नामक धार्मिक परंपरा के साथ होता है।
संत एकनाथ षष्ठी के उत्सव का स्वरूप
संत एकनाथ षष्ठी का उत्सव भक्ति और आध्यात्मिकता से भरपूर होता है।
इस दिन संत एकनाथ महाराज द्वारा रचित भारुद और अभंग विशेष रूप से गाए जाते हैं। भारुद एक प्रकार की लोककाव्य शैली है जिसके माध्यम से समाज को शिक्षा और संदेश दिया जाता है।
इन कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को नैतिकता, मानवता और धर्म के सही अर्थ की शिक्षा दी जाती है।
पैठण में स्थित संत एकनाथ महाराज के मंदिर परिसर में लगातार भजन, कीर्तन और नामस्मरण की ध्वनि गूंजती रहती है।
इस दिन भक्त भगवान विट्ठल का नाम जपते हैं और संत एकनाथ के जीवन से प्रेरणा लेते हैं।
संत एकनाथ महाराज को प्रिय प्रसाद
संत एकनाथ षष्ठी के अवसर पर भक्त विशेष रूप से पूरनपोली का प्रसाद अर्पित करते हैं।
महाराष्ट्र की पारंपरिक मिठाई पूरनपोली को संत एकनाथ महाराज का प्रिय नैवेद्य माना जाता है। इसलिए इस दिन मंदिरों और घरों में पूरनपोली बनाकर भगवान को अर्पित की जाती है और बाद में प्रसाद के रूप में वितरित की जाती है।
संत एकनाथ महाराज का साहित्यिक योगदान
संत एकनाथ महाराज केवल संत ही नहीं बल्कि एक महान साहित्यकार भी थे। उन्होंने कई महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथों की रचना और व्याख्या की।
उन्होंने श्रीमद्भागवत पुराण के ग्यारहवें अध्याय पर मराठी टीका लिखी जिसे “एकनाथी भागवत” कहा जाता है।
इसके अलावा उन्होंने भावार्थ रामायण की रचना की जिसमें रामायण की कथा को सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है।
उनकी अन्य प्रमुख रचनाओं में चतुश्लोकी भागवत, रुक्मिणी स्वयंवर, संत चरित्र और आनंद लहरी शामिल हैं।
उनके अभंग और भारुद आज भी महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
संत एकनाथ महाराज का सामाजिक योगदान
संत एकनाथ महाराज ने समाज में प्रचलित कई कुरीतियों का विरोध किया।
उन्होंने जातिगत भेदभाव, अंधविश्वास और सामाजिक असमानता के खिलाफ आवाज उठाई।
उन्होंने लोगों को यह सिखाया कि सच्ची भक्ति केवल पूजा-पाठ में नहीं बल्कि मानव सेवा और करुणा में है।
उनका संदेश था कि सभी धर्मों और जातियों के लोग एक साथ प्रेम और भाईचारे के साथ रहें।
संत एकनाथ षष्ठी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि मानवता, समानता और भक्ति के महान संदेश को याद करने का अवसर है। संत एकनाथ महाराज का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा धर्म वही है जिसमें करुणा, प्रेम और समानता हो।
आज भी उनके विचार और शिक्षाएं समाज को सही दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। संत एकनाथ षष्ठी का यह पावन पर्व हमें उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा देता है।



