मिलावट
मिलावट के इस दौर में,
मिल रहा नकली अमावट है।
प्यार की मण्डी में
वासना की लबालब मिलावट है।
सँभल कर चलना बच्चू !
इस शहर में हर गली-हर कूचे में बहुत फिसलन है।
माँ के प्यार, ममता, दूध-सा शुद्ध कोई नहीं,
सिर्फ इजहारेइश्क का चलन है।
जो बर्फ-सा लगता ठंढा तुम्हें,
तासीर उसकी भी गरम है।
कठोर से भी ज्यादा कठोर जो है यहाँ,
बाहर से दिखता वह भी नरम है।
किसको कहोगे अपना इस शहर में ?
बस स्वार्थ के सम्बन्ध फलते-फूलते यहाँ।
भरत-सा भाई, श्रवण-सा सुत, सावित्री-सी सती
अब इस दौर में दिखती कहाँ ?
फूंक-फूंक कर कदम रखना ये मुसाफिर !
चींटियों की राह में चलते हाथी जिस कदर।
लेखक
श्री विनय शंकर दीक्षित
“आशु”
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