सनातन परंपरा में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता के रूप में स्वीकार किया गया है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनके स्मरण से होती है। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाने वाली ढुण्ढिराज गणेश चतुर्थी इसी परंपरा का विशेष उत्सव है।
इसे मनोरथ चतुर्थी भी कहा जाता है, क्योंकि मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक व्रत और पूजा करने से सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 21 फरवरी को मनाया जाएगा और इस दिन शुभ, शुक्ल तथा रवि योग का विशेष संयोग बन रहा है, जो इसके आध्यात्मिक महत्व को और बढ़ा देता है।
तिथि और शुभ मुहूर्त
द्रिक पंचांग के अनुसार फाल्गुन शुक्ल चतुर्थी 20 फरवरी 2026 को दोपहर 2:37 बजे प्रारंभ होगी और 21 फरवरी 2026 को दोपहर 1:00 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के आधार पर मुख्य व्रत और पूजा 21 फरवरी को ही की जाएगी। चतुर्थी तिथि स्वयं में गणेश उपासना के लिए श्रेष्ठ मानी जाती है, और जब यह शुभ योगों के साथ आए तो इसका प्रभाव और भी बढ़ जाता है।
ढुण्ढिराज स्वरूप का महत्व
भगवान गणेश के अनेक रूपों में ढुण्ढिराज स्वरूप विशेष रूप से मनोरथ पूर्ण करने वाले माने जाते हैं। मत्स्य पुराण में इसे मनोरथ चतुर्थी कहा गया है, जबकि वाराह पुराण में इसे अविघ्नकर व्रत का नाम दिया गया है। शास्त्रों में वर्णित है कि इस व्रत के पालन से विघ्न दूर होते हैं और कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ की सफलता हेतु, भगवान शिव ने त्रिपुरासुर वध से पूर्व और भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन से पहले इस व्रत का पालन किया था। यह संकेत देता है कि यह व्रत केवल सामान्य जीवन के लिए नहीं, बल्कि बड़े उद्देश्यों और महत्वपूर्ण कार्यों की सिद्धि के लिए भी किया जाता रहा है।
क्यों मनाई जाती है ढुण्ढिराज चतुर्थी
इस दिन व्रत रखने और गणेश जी की पूजा करने से जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं। विशेष रूप से जो लोग नया व्यवसाय आरंभ कर रहे हों, शिक्षा में नई दिशा चाहते हों या विवाह संबंधी बाधाओं का सामना कर रहे हों, उनके लिए यह दिन अत्यंत शुभ माना जाता है। गणेश उपासना से मानसिक संतुलन, आत्मविश्वास और निर्णय क्षमता में वृद्धि की मान्यता है।
पूजा विधि विस्तार से
प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ पीले या लाल वस्त्र धारण करें। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत का संकल्प लें।
गणेश जी की मूर्ति को पंचामृत और गंगाजल से स्नान कराएं। 21 दूर्वा की गांठें अर्पित करें, क्योंकि दूर्वा गणपति को अत्यंत प्रिय है। सिंदूर का तिलक लगाएं और लाल पुष्प चढ़ाएं।
मोदक, बेसन के लड्डू या तिल-गुड़ का नैवेद्य अर्पित करें। धूप-दीप प्रज्वलित कर गणेश अथर्वशीर्ष या संकष्ट नाशन स्तोत्र का पाठ करें।
सायंकाल चंद्र दर्शन के बाद चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। अर्घ्य देते समय चंद्र मंत्र का उच्चारण कर अंत में गणेश जी की आरती करें और प्रसाद वितरित करें। व्रत का पारण चंद्र दर्शन के पश्चात ही करना चाहिए।
आध्यात्मिक और पारिवारिक प्रभाव
ढुण्ढिराज चतुर्थी केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और सकारात्मक ऊर्जा का दिवस है। इस दिन की उपासना से परिवार में सौहार्द, आर्थिक स्थिरता और मानसिक शांति की कामना की जाती है। श्रद्धा और संयम से किया गया व्रत आत्मबल को बढ़ाता है और जीवन में नई दिशा देता है।
ढुण्ढिराज गणेश चतुर्थी 2026 एक ऐसा अवसर है जब भक्तजन अपने विघ्नों को दूर करने और मनोरथ सिद्धि की कामना से गणपति का स्मरण करेंगे। शुभ योगों का संयोग इसे और अधिक प्रभावशाली बनाता है।
यदि श्रद्धा, नियम और भक्ति के साथ यह व्रत किया जाए, तो जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का अनुभव संभव है। गणेश जी की कृपा से हर शुभ कार्य सिद्ध हो — यही इस पावन तिथि का संदेश है।




