भारतीय संस्कृति में सप्ताह के प्रत्येक दिन को किसी-न-किसी देवता की उपासना के लिए समर्पित किया गया है। रविवार का दिन सूर्यदेव को अर्पित है। सूर्यदेव न केवल जगत के प्रकाशदाता हैं, बल्कि जीवन, स्वास्थ्य, यश और समृद्धि के भी अधिष्ठाता माने जाते हैं। रविवार व्रत करने से जीवन की अनेक बाधाएँ दूर होती हैं और भक्त को मान-सम्मान, आरोग्य तथा धन-धान्य की प्राप्ति होती है।
यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए श्रेष्ठ माना गया है जो मानसिक और शारीरिक कष्टों से पीड़ित हैं या जिनके जीवन में यश और सम्मान की कमी है। शास्त्रों के अनुसार नियमित रविवार व्रत और सूर्यदेव की आराधना से हर असंभव कार्य भी संभव हो जाता है।
रविवार व्रत करने की विधि
सूर्यदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए रविवार व्रत में कुछ विशेष नियमों और पूजन विधियों का पालन आवश्यक है।
- व्रत की अवधि – इसे लगातार 12 रविवार, 30 रविवार अथवा एक वर्ष तक किया जा सकता है।
- स्नान और वस्त्र – सूर्योदय से पूर्व उठकर शुद्ध होकर स्नान करें और लाल वस्त्र धारण करें।
- पूजन स्थल – घर में पवित्र स्थान पर सूर्यदेव की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित करें।
- पूजन सामग्री – गंध, पुष्प, चंदन, अक्षत, दूर्वा और लाल पुष्प अर्पित करें।
- मंत्र जाप –
“ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः”
इस मंत्र का 3, 5 या 12 माला जाप करें। - अर्घ्यदान – तांबे के पात्र में शुद्ध जल, अक्षत, दूर्वा, लाल पुष्प मिलाकर सूर्य को अर्घ्य दें।
- भोजन नियम – सात्विक आहार करें। गेहूँ, दही, दूध, घी, दलिया और चीनी का सेवन करें। इस दिन नमक का त्याग करना चाहिए।
- कथा श्रवण – पूजा के बाद रविवार व्रत कथा सुनना अनिवार्य है।
रविवार व्रत की पौराणिक कथा
प्राचीन काल में एक बुढ़िया रहती थी। वह नियमित रूप से रविवार का व्रत करती। रविवार के दिन सूर्योदय से पहले उठकर बुढ़िया स्नानादि से निवृत्त होकर आंगन को गोबर से लीपकर स्वच्छ करती, उसके बाद सूर्य भगवान की पूजा करते हुए रविवार व्रत कथा सुनकर सूर्य भगवान का भोग लगाकर दिन में एक समय भोजन करती। सूर्य भगवान की अनुकंपा से बुढ़िया को किसी प्रकार की चिंता एवं कष्ट नहीं था। धीरे-धीरे उसका घर धन-धान्य से भर रहा था।
उस बुढ़िया को सुखी होते देख उसकी पड़ोसन उससे जलने लगी। बुढ़िया ने कोई गाय नहीं पाल रखी थी। अतः वह अपनी पड़ोसन के आंगन में बंधी गाय का गोबर लाती थी। पड़ोसन ने कुछ सोचकर अपनी गाय को घर के भीतर बांध दिया। रविवार को गोबर न मिलने से बुढ़िया अपना आंगन नहीं लीप सकी। आंगन न लीप पाने के कारण उस बुढ़िया ने सूर्य भगवान को भोग नहीं लगाया और उस दिन स्वयं भी भोजन नहीं किया। सूर्यास्त होने पर बुढ़िया भूखी-प्यासी सो गई।
प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उस बुढ़िया की आंख खुली तो वह अपने घर के आंगन में सुंदर गाय और बछड़े को देखकर हैरान हो गई। गाय को आंगन में बांधकर उसने जल्दी से उसे चारा लाकर खिलाया। पड़ोसन ने उस बुढ़िया के आंगन में बंधी सुंदर गाय और बछड़े को देखा तो वह उससे और अधिक जलने लगी। तभी गाय ने सोने का गोबर किया। गोबर को देखते ही पड़ोसन की आंखें फट गईं।
पड़ोसन ने उस बुढ़िया को आसपास न पाकर तुरंत उस गोबर को उठाया और अपने घर ले गई तथा अपनी गाय का गोबर वहां रख आई। सोने के गोबर से पड़ोसन कुछ ही दिनों में धनवान हो गई। गाय प्रति दिन सूर्योदय से पूर्व सोने का गोबर किया करती थी और बुढ़िया के उठने के पहले पड़ोसन उस गोबर को उठाकर ले जाती थी।
बहुत दिनों तक बुढ़िया को सोने के गोबर के बारे में कुछ पता ही नहीं चला। बुढ़िया पहले की तरह हर रविवार को भगवान सूर्यदेव का व्रत करती रही और कथा सुनती रही। लेकिन सूर्य भगवान को जब पड़ोसन की चालाकी का पता चला तो उन्होंने तेज आंधी चलाई। आंधी का प्रकोप देखकर बुढ़िया ने गाय को घर के भीतर बांध दिया। सुबह उठकर बुढ़िया ने सोने का गोबर देखा उसे बहुत आश्चर्य हुआ।
उस दिन के बाद बुढ़िया गाय को घर के भीतर बांधने लगी। सोने के गोबर से बुढ़िया कुछ ही दिन में बहुत धनी हो गई। उस बुढ़िया के धनी होने से पड़ोसन बुरी तरह जल-भुनकर राख हो गई और उसने अपने पति को समझा-बुझाकर उसे नगर के राजा के पास भेज दिया। सुंदर गाय को देखकर राजा बहुत खुश हुआ। सुबह जब राजा ने सोने का गोबर देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा।
उधर सूर्य भगवान को भूखी-प्यासी बुढ़िया को इस तरह प्रार्थना करते देख उस पर बहुत करुणा आई। उसी रात सूर्य भगवान ने राजा को स्वप्न में कहा, राजन, बुढ़िया की गाय व बछड़ा तुरंत लौटा दो, नहीं तो तुम पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ेगा. तुम्हारा महल नष्ट हो जाएगा। सूर्य भगवान के स्वप्न से बुरी तरह भयभीत राजा ने प्रातः उठते ही गाय और बछड़ा बुढ़िया को लौटा दिया।
राजा ने बहुत-सा धन देकर बुढ़िया से अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी। राजा ने पड़ोसन और उसके पति को उनकी इस दुष्टता के लिए दंड दिया। फिर राजा ने पूरे राज्य में घोषणा कराई कि सभी स्त्री-पुरुष रविवार का व्रत किया करें। रविवार का व्रत करने से सभी लोगों के घर धन-धान्य से भर गए, राजतय में चारों ओर खुशहाली छा गई। स्त्री-पुरुष सुखी जीवन यापन करने लगे तथा सभी लोगों के शारीरिक कष्ट भी दूर हो गए।
रविवार व्रत से प्राप्त फल
- मानसिक और शारीरिक रोगों का नाश।
- जीवन में यश, कीर्ति और सम्मान की प्राप्ति।
- स्त्रियों का बांझपन दूर होता है।
- धन-धान्य और समृद्धि की प्राप्ति।
- परिवार में शांति और सुख-समृद्धि का वास।
- पापों का क्षय और मोक्ष की प्राप्ति।
आरती
श्री सूर्य देव की आरती
जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव।
जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव॥
रजनीपति मदहारी, शतदल जीवनदाता।
षटपद मन मुदकारी, हे दिनमणि दाता॥
जग के हे रविदेव, जय जय जय रविदेव।
जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव॥
नभमंडल के वासी, ज्योति प्रकाशक देवा।
निज जन हित सुखरासी, तेरी हम सबें सेवा॥
करते हैं रविदेव, जय जय जय रविदेव।
जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव॥
कनक बदन मन मोहित, रुचिर प्रभा प्यारी।
निज मंडल से मंडित, अजर अमर छविधारी॥
हे सुरवर रविदेव, जय जय जय रविदेव।
जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव॥
श्री रविवार की आरती
कहुं लगि आरती दास करेंगे,
सकल जगत जाकि जोति विराजे।
सात समुद्र जाके चरण बसे,
काह भयो जल कुंभ भरे हो राम।
कोटि भानु जाके नख की शोभा,
कहा भयो मंदिर दीप धरे हो राम।
भार अठारह रामा बलि जाके,
कहा भयो शिर पुष्प धरे हो राम।
छप्पन भोग जाके प्रतिदिन लागे,
कहा भयो नैवेद्य धरे हो राम।
अमित कोटि जाके बाजा बाजें,
कहा भयो झनकारा करे हो राम।
चार वेद जाके मुख की शोभा,
कहा भयो ब्रह्मावेद पढ़े हो राम।
शिव सनकादिक आदि ब्रह्मादिक,
नारद मुनि जाको ध्यान धरे हो राम।
हिम मंदार जाके पवन झकोरें,
कहा भयो शिव चंवर ढुरे हो राम।
लख चौरासी बंध छुड़ाए,
केवल हरियश नामदेव गाए हो राम।
रविवार व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आत्मिक और मानसिक शांति का मार्ग भी है। सूर्यदेव की उपासना से जीवन में न केवल यश और धन की प्राप्ति होती है, बल्कि शरीर में ऊर्जा और मन में उत्साह का संचार होता है।
नियमित रविवार व्रत, कथा-श्रवण और सूर्यदेव की आरती करने से जीवन में हर प्रकार की बाधा दूर होकर सफलता के मार्ग खुलते हैं।