हिंदू धर्म में प्रत्येक तिथि और पर्व का अपना एक गूढ़ महत्व है। इन्हीं में से एक है अघोरा चतुर्दशी, जो भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। यह दिन विशेष रूप से पितृ तर्पण, शिव पूजा और तंत्र कार्यों की सिद्धि के लिए जाना जाता है। शास्त्रों में इसे कुशाग्रहणी अमावस्या या कुशोत्पाटिनी अमावस्या भी कहा गया है।
भारत के हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, नेपाल और पूर्वोत्तर राज्यों में यह पर्व विशेष श्रद्धा और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। लोक मान्यता के अनुसार इसे डगयाली भी कहा जाता है। पहले दिन छोटी डगयाली और दूसरे दिन बड़ी डगयाली के नाम से इसे दो दिन तक मनाने की परंपरा है।
अघोरा चतुर्दशी 2025 का शुभ मुहूर्त
- तिथि प्रारंभ: 21 अगस्त 2025, दोपहर 12:44 बजे
- तिथि समाप्त: 22 अगस्त 2025, प्रातः 11:55 बजे
- इस दिन मासिक शिवरात्रि और गुरु पुष्य योग का संयोग होने से यह पर्व और भी विशेष हो जाता है।
अघोरा चतुर्दशी का महत्व
अघोरा चतुर्दशी का संबंध विशेष रूप से पितरों की शांति और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति से है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन शिवजी की पूजा, उपवास, दान और पितृ तर्पण करने से आत्माओं को तृप्ति मिलती है और साधक के जीवन से संकट दूर होते हैं।
इस तिथि को खासकर इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि मान्यता है कि इस दिन शिवगण और अदृश्य आत्माएं स्वतंत्र रूप से विचरण करते हैं। इसलिए लोग घरों में कांटेदार झाड़ियां लगाकर बुरी शक्तियों से रक्षा करते हैं।
अघोरा चतुर्दशी पर कुशा संग्रहण
इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है कुशा (पवित्र घास) का संग्रहण।
- कुशा का प्रयोग सभी धार्मिक अनुष्ठानों, श्राद्ध कर्म और देव पूजन में आवश्यक है।
- इस दिन एकत्रित की गई कुशा पूरे वर्ष के लिए उपयोगी मानी जाती है।
- उचित कुशा वही मानी जाती है जो हरी हो, सात पत्तों वाली हो और उसका कोई हिस्सा टूटा न हो।
- इसे तोड़ते समय “हूं फट्” मंत्र का जाप किया जाता है।
पितृ तर्पण और श्राद्ध का महत्व
अघोरा चतुर्दशी का एक बड़ा महत्व पितृ तर्पण और श्राद्ध कर्म से जुड़ा है।
- इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके शिव पूजा और पितरों के लिए जल अर्पण किया जाता है।
- मान्यता है कि इस दिन का तर्पण सीधे पितरों तक पहुंचता है और उनकी आत्मा को शांति मिलती है।
- पितर प्रसन्न होकर अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं, जिससे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
अघोरा चतुर्दशी और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा
इस तिथि को नकारात्मक ऊर्जाएं विशेष रूप से सक्रिय होती हैं।
- हिमाचल और उत्तराखंड के कुछ हिस्सों में लोग घरों की खिड़कियों और दरवाजों पर कांटेदार झाड़ियां लगाते हैं ताकि बुरी आत्माएं घर में प्रवेश न कर सकें।
- कुछ क्षेत्रों में इस दिन विशेष हवन और तंत्र साधना की जाती है, ताकि साधक को सिद्धियां प्राप्त हों और वह भय से मुक्त हो सके।
- शिवजी का ध्यान और महा मृत्युंजय मंत्र का जाप करने से मानसिक शांति और सुरक्षा प्राप्त होती है।
अघोरा चतुर्दशी का ज्योतिषीय महत्व
ज्योतिष शास्त्र में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को अत्यंत शक्तिशाली माना गया है।
- इस दिन किए गए व्रत, जप, दान और तप से व्यक्ति के जीवन से पाप और ऋण समाप्त होते हैं।
- स्वास्थ्य ज्योतिष के अनुसार, इस दिन की गई साधना से रोग और मानसिक तनाव दूर होते हैं।
- यदि यह दिन विशेष नक्षत्र और वार (शनिवार, सोमवार या गुरुवार) पर पड़े तो इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
अघोरा चतुर्दशी पर करने योग्य कार्य
- प्रातःकाल स्नान कर शिवजी का ध्यान करें।
- भगवान शिव को बेलपत्र, जल, दूध और धतूरा अर्पित करें।
- पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध करें।
- उपवास रखें और दिनभर जप-ध्यान करें।
- शाम को दीपक जलाकर शिव आरती करें।
- गरीबों और ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र और दक्षिणा दान करें।
- घर में कांटेदार झाड़ियां लगाकर नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा करें।
अघोरा चतुर्दशी केवल एक धार्मिक पर्व ही नहीं बल्कि यह आत्मा की शुद्धि, पितरों की तृप्ति और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति का अवसर है। यह दिन हमें जीवन में संयम, साधना और दान-पुण्य की महत्ता का बोध कराता है।
यदि श्रद्धा और विश्वास से शिवजी तथा पितरों का पूजन किया जाए तो जीवन के सभी कष्ट दूर होकर सुख-शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।



