भगवान शिव, जिन्हें संहारक और सृजनहार दोनों माना जाता है, उनका रूप अक्सर भयंकर और रौद्र माना जाता है। उनके शरीर पर चिताभस्म, जटाओं में गंगा और गले में मुंडमाला उनके विराट और विकराल स्वरूप को दर्शाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव का एक ऐसा रूप भी है, जो करोड़ों कामदेव को भी मात दे सकता है?
यह कथा भगवान शिव के उस अद्भुत और अतुलनीय सौंदर्य की है, जिसे देखकर स्वयं गणेशजी भी अचंभित हो गए।
गणेशजी की इच्छा
एक बार गणेशजी ने भगवान शिव से कहा, “पिताजी! आप यह चिताभस्म लगाकर और मुंडमाला धारण करके अच्छे नहीं लगते। मेरी माता गौरी तो अपूर्व सुंदरी हैं, और आप उनके साथ इस भयंकर रूप में।
पिताजी, कृपा करके एक बार अपने सुंदर रूप में माता के सम्मुख आइए, जिससे हम आपका असली स्वरूप देख सकें।”
भगवान शिव ने गणेशजी की बात मान ली और उनकी इच्छा पूरी करने का निर्णय लिया।
भगवान शिव का मनमोहक रूप
कुछ समय बाद, जब भगवान शिव स्नान करके लौटे, तो उनका रूप पूरी तरह से बदल चुका था। उनके शरीर पर चिताभस्म नहीं थी, उनकी बिखरी हुई जटाएं सँवर चुकी थीं, और मुंडमाला भी उतर चुकी थी।
उनका यह रूप इतना मनमोहक था कि सभी देवता, यक्ष, गंधर्व और शिवगण उन्हें एकटक देखते रह गए। यह रूप इतना अद्भुत था कि मोहिनी अवतार भी इसके सामने फीका पड़ जाए।
भगवान शिव ने अपना यह रूप कभी प्रकट नहीं किया था। यह रूप करोड़ों कामदेव को भी मात देने वाला था। गणेशजी अपने पिता की इस मनमोहक छवि को देखकर स्तब्ध रह गए।
उन्होंने मस्तक झुकाकर कहा, “पिताजी, मुझे क्षमा करें। अब आप अपने पूर्व स्वरूप को धारण कर लीजिए।”
गणेशजी का निवेदन
भगवान शिव ने पूछा, “क्यों पुत्र? अभी तो तुमने ही मुझे इस रूप में देखने की इच्छा प्रकट की थी। अब पुनः पूर्व स्वरूप में आने की बात क्यों?”
गणेशजी ने मस्तक झुकाए हुए कहा, “क्षमा करें पिताश्री। मेरी माता से सुंदर कोई और दिखे, मैं ऐसा कदापि नहीं चाहता।”
भगवान शिव मुस्कुराए और अपने पुराने स्वरूप में लौट आए।
संतों का अनुभव
कई संतों और महात्माओं ने अपने अनुभव से कहा है कि भगवान शिव का रूप “कर्पूरगौरं शंकर” श्रीराम से भी सुंदर है। लेकिन वह अपना यह निज स्वरूप कभी प्रकट नहीं करते, क्योंकि इससे उनके प्रियतम आराध्य श्रीरामजी की सुंदरता के यश में कमी होगी।
यह कथा भगवान शिव के उस अद्भुत सौंदर्य को दर्शाती है, जो उनके भयंकर और रौद्र रूप के पीछे छिपा हुआ है। यह हमें यह सीख देती है कि सच्चा सौंदर्य बाहरी रूप में नहीं, बल्कि आंतरिक गुणों और भक्ति में होता है।
भगवान शिव का यह रूप हमें यह भी याद दिलाता है कि वे न केवल संहारक हैं, बल्कि सृजन और सौंदर्य के भी प्रतीक हैं।
।। ॐ नमः शिवाय ।।