21 अक्टूबर 1943 का दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वह क्षण था जब पहली बार भारत के बाहर एक स्वतंत्र सरकार की स्थापना हुई — आजाद हिंद सरकार। इस सरकार का नेतृत्व किया था उस व्यक्तित्व ने, जिसे आज भी भारत “नेताजी सुभाष चंद्र बोस” के नाम से गर्व से याद करता है।
नेताजी ने इस दिन सिंगापुर में आजाद हिंद फौज के सर्वोच्च सेनापति के रूप में स्वतंत्र भारत की प्रांतीय सरकार की घोषणा की थी। यह सिर्फ एक सरकार नहीं, बल्कि अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की एक आग थी जिसने भारत की आज़ादी की ज्वाला को तेज़ कर दिया।
आज़ादी की तैयारी: संघर्ष, रणनीति और नेतृत्व
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जीवन संघर्ष और साहस का पर्याय था। 1921 से 1941 तक उन्हें ब्रिटिश सरकार ने 11 बार जेल भेजा, परंतु उनके विचारों की लौ कभी मंद नहीं पड़ी।
1941 में उन्होंने अंग्रेजों की गिरफ्त से भागकर जर्मनी का रुख किया और वहाँ हिटलर से मुलाकात की। उनका उद्देश्य स्पष्ट था — भारत की आज़ादी के लिए वैश्विक समर्थन जुटाना।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने जापान और अन्य धुरी राष्ट्रों से संपर्क कर “आजाद हिंद फौज” की स्थापना की दिशा में कदम बढ़ाए।
रासबिहारी बोस और आजाद हिंद फौज की नींव
आजाद हिंद फौज की नींव 1942 में जापान में पड़ी, जब क्रांतिकारी नेता रासबिहारी बोस ने टोक्यो में इसका गठन किया। इस संगठन में वे भारतीय सैनिक शामिल थे जिन्हें जापान ने ब्रिटिश सेना से युद्ध के दौरान बंदी बनाया था।
रासबिहारी बोस ने बाद में इस संगठन का नेतृत्व सुभाष चंद्र बोस को सौंप दिया, जिन्होंने इसे एक अनुशासित, प्रेरक और संगठित सैन्य शक्ति में बदल दिया।
महिला शक्ति का योगदान — कैप्टन लक्ष्मी सहगल और झाँसी रेजीमेंट
आजाद हिंद फौज की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक थी “रानी झाँसी रेजीमेंट” की स्थापना, जिसका नेतृत्व कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन सहगल ने किया। यह यूनिट उन साहसी महिलाओं की मिसाल थी जिन्होंने नेताजी के “चलो दिल्ली” के नारे को अपना जीवन-लक्ष्य बना लिया था।
आजाद हिंद बैंक और राष्ट्र की आर्थिक पहचान
साल 1943 में नेताजी ने “आजाद हिंद बैंक” की स्थापना की। इस बैंक ने दस रुपये से लेकर एक लाख रुपये तक के नोट जारी किए थे, जिन पर सुभाष चंद्र बोस की तस्वीर छपी थी।
यह कदम केवल आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतीक नहीं था, बल्कि यह घोषणा भी थी कि भारत अपने भाग्य का निर्धारण स्वयं करेगा। आजाद हिंद सरकार का अपना डाक-टिकट, झंडा और राष्ट्रगान भी था — जन गण मन, जिसे उस समय राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया गया था।
“चलो दिल्ली” का आह्वान
नेताजी का सबसे प्रसिद्ध नारा — “चलो दिल्ली” — सिर्फ एक युद्ध घोष नहीं था, बल्कि भारत की आत्मा का पुकार था।
1944 में आजाद हिंद फौज ने बर्मा सीमा से भारत में प्रवेश किया और इम्फाल अभियान चलाया।
हालांकि यह अभियान सैन्य रूप से सफल नहीं रहा, लेकिन इसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। भारत की जनता में राष्ट्रवाद की लहर दौड़ गई और अंग्रेज़ों को यह अहसास हो गया कि भारतीय अब स्वतंत्रता से पीछे नहीं हटेंगे।
अंतरराष्ट्रीय समर्थन और भारत की कूटनीति
आजाद हिंद सरकार को जापान, जर्मनी, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड जैसे देशों ने मान्यता दी थी। इस मान्यता ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को वैश्विक स्तर पर एक राजनीतिक स्वरूप दिया। यह भारत की पहली ऐसी सरकार थी जिसे विदेशी शक्तियों ने वैध मान्यता दी, जिससे ब्रिटिश साम्राज्य की प्रतिष्ठा विश्व मंच पर डगमगा गई।
आजाद हिंद फौज की विरासत
आजाद हिंद फौज ने सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों से भी युद्ध लड़ा। नेताजी का दृष्टिकोण स्पष्ट था —
“स्वतंत्रता माँगी नहीं जाती, उसे छीनना पड़ता है।”
इस फौज के सैनिकों ने अद्भुत बलिदान दिया और देश के प्रति समर्पण का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जो आज भी भारतीय सेना के मूल्यों में झलकता है। उनकी वीरता ने 1947 की आज़ादी की राह को तीव्र कर दिया।
“आजाद हिंद फौज स्थापना दिवस” केवल एक ऐतिहासिक तिथि नहीं, बल्कि यह उस संघर्ष, समर्पण और अदम्य साहस का प्रतीक है जिसने भारत को आज़ाद भारत बनने की दिशा दिखाई। नेताजी सुभाष चंद्र बोस का आदर्श आज भी हर भारतीय के हृदय में गूंजता है —
“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।”



