हिंदू पंचांग और धर्मग्रंथों में माघ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को अत्यंत पुण्यदायी और फलदायी माना गया है। इस तिथि को वरद चतुर्थी, तिलकुंड चतुर्थी और वरद–तिल–कुंड चौथ के नाम से जाना जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से भगवान श्रीगणेश और चंद्रदेव की उपासना को समर्पित है।
पुराणों और व्रत कथाओं में वर्णित है कि इस दिन विधिपूर्वक व्रत और पूजन करने से जीवन के सभी संकटों का नाश होता है तथा घर में सुख, समृद्धि और शांति का वास बना रहता है।
भगवान श्रीगणेश को विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य देव कहा गया है। किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश पूजन का विधान इसी कारण है। वरद–तिल–कुंड चतुर्थी का विशेष महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इस दिन भगवान गणेश अपने भक्तों को विशेष रूप से वरदान प्रदान करते हैं।
‘वरद’ शब्द का अर्थ ही होता है – वर देने वाला। इस दिन किया गया व्रत न केवल सांसारिक सुख प्रदान करता है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त करता है।
वरद–तिल–कुंड चतुर्थी 2026 का शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में माघ शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि का आरंभ 22 जनवरी 2026 को प्रातः 02:47 बजे होगा और इसका समापन 23 जनवरी 2026 को प्रातः 02:29 बजे होगा।
इस दिन चतुर्थी का मध्याह्न काल विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना गया है। मध्याह्न मुहूर्त सुबह 11:43 बजे से दोपहर 1:57 बजे तक रहेगा। शास्त्रों के अनुसार इसी समय भगवान गणेश का पूजन करना अत्यंत शुभ और फलदायी होता है।
इस व्रत में चंद्र दर्शन का भी विशेष नियम होता है। वरद–तिल–कुंड चतुर्थी के दिन वर्जित चंद्रोदय काल शाम 5:26 बजे से रात 8:47 बजे तक रहेगा। इस अवधि में चंद्रमा के दर्शन से बचने की परंपरा है, क्योंकि चतुर्थी तिथि पर चंद्र दर्शन को दोषपूर्ण माना गया है।
वरद–तिल–कुंड चतुर्थी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
हिंदू पुराणों में वरद–तिल–कुंड चतुर्थी को अत्यंत पुण्यकारी व्रत बताया गया है। इस दिन तिल, कुंड और तिलकूट का विशेष महत्व होता है। तिल को शुद्धता, त्याग और पवित्रता का प्रतीक माना गया है। इसी कारण इस दिन तिल से बने व्यंजन, तिल-गुड़ और तिल का दान विशेष फलदायी माना गया है।
यह व्रत विशेष रूप से महिलाओं के लिए अत्यंत उपयोगी और कल्याणकारी बताया गया है। मान्यता है कि जो महिलाएं श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत को करती हैं, उनके वैवाहिक जीवन में सुख, प्रेम और स्थायित्व बना रहता है।
साथ ही उन्हें अखंड सौभाग्य का वरदान प्राप्त होता है। घर-परिवार में आर्थिक उन्नति, व्यापार में वृद्धि और संतान सुख की प्राप्ति भी इस व्रत के प्रभाव से जुड़ी मानी जाती है।
क्यों करें वरद–तिल–कुंड चतुर्थी का व्रत
वरद–तिल–कुंड चतुर्थी का व्रत करने से भक्त को मानसिक शांति, आत्मबल और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है। भगवान गणेश की उपासना से जीवन की बाधाएं स्वतः दूर होने लगती हैं। यह व्रत व्यक्ति को धैर्य, विवेक और निर्णय क्षमता प्रदान करता है।
महिलाओं द्वारा यह व्रत करने से परिवार के सभी सदस्यों के कार्यों में उन्नति होती है। विशेष रूप से पति के व्यापार, नौकरी और आर्थिक स्थिति में स्थायित्व और प्रगति देखी जाती है।
दांपत्य जीवन में मधुरता बढ़ती है और पारिवारिक कलह समाप्त होती है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस व्रत से घर में स्थायी सुख-समृद्धि का वास होता है।
वरद–तिल–कुंड चतुर्थी पूजन विधि
वरद–तिल–कुंड चतुर्थी के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा स्थान को साफ कर भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पूजन करते समय मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखना शुभ माना गया है।
इसके बाद शांत चित्त होकर आसन पर बैठें और विधिपूर्वक भगवान गणेश का पूजन आरंभ करें। धूप और दीप प्रज्वलित करें। भगवान गणेश को फल, फूल, अक्षत, रोली और मौली अर्पित करें।
पंचामृत से स्नान कराने के बाद तिल अथवा तिल-गुड़ का भोग लगाएं। तिल से बने लड्डू या मिठाई का विशेष महत्व होता है।
पूजन के दौरान भक्त को ‘ॐ श्रीगणेशाय नमः’ मंत्र का कम से कम 108 बार जाप अवश्य करना चाहिए। यह मंत्र मानसिक शांति और विघ्न नाश में सहायक माना गया है। शाम के समय व्रत कथा का श्रवण करें और भगवान गणेश की आरती करें।
इस दिन अपनी सामर्थ्य के अनुसार तिल, गर्म कपड़े, कंबल या वस्त्रों का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। अंत में गणेश मंदिर के पुजारी या किसी ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए। इससे व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
वरद–तिल–कुंड चतुर्थी व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन में संतुलन, सुख और सकारात्मकता लाने का माध्यम है। यह व्रत व्यक्ति को कर्म, श्रद्धा और सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। भगवान गणेश की कृपा से जीवन के सभी विघ्न दूर होते हैं और स्थायी सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।