ऊब छठ व्रत, जिसे चन्दन षष्ठी, चानन छठ, चंद्र छठ और हलषष्ठी के नाम से भी जाना जाता है, भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि लोक परंपराओं और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों और कृषक परिवारों में इसकी विशेष मान्यता है।
शुभ मुहूर्त (2025)
- षष्ठी तिथि प्रारंभ: 14 अगस्त, सुबह 4:23 बजे
- षष्ठी तिथि समाप्त: 15 अगस्त, सुबह 2:07 बजे
- व्रत दिनांक: 14 अगस्त 2025 (उदय तिथि के अनुसार)
ऊब छठ का महत्व
इस व्रत का सबसे प्रमुख कारण भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी का जन्मोत्सव है। बलराम जी का मुख्य शस्त्र हल था, जो कृषि का प्रतीक है, इसलिए इस व्रत को हलषष्ठी भी कहा जाता है।
कृषक समुदाय इस दिन को खेती-बाड़ी, पशुपालन और परिवार की उन्नति के लिए शुभ मानता है। वहीं, कई क्षेत्रों में इसे चंद्र षष्ठी के रूप में भी मनाया जाता है, जहां चंद्रमा की पूजा और दर्शन विशेष रूप से किए जाते हैं।
पूजा विधि और नियम
- व्रत आरंभ – महिलाएं एवं युवतियां प्रातः स्नान कर व्रत संकल्प लेती हैं और दिन भर जल-आहार त्याग करती हैं।
- शाम की तैयारी – सूर्यास्त से पूर्व पुनः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं।
- मंदिर दर्शन – देवी-देवताओं के मंदिर जाकर भजन-कीर्तन करती हैं।
- पूजन सामग्री –
- कुमकुम, चावल, चन्दन
- सुपारी, पान, कपूर
- फल, सिक्का, सफ़ेद फूल
- अगरबत्ती, दीपक
- चांद की पूजा – चंद्रमा को जल अर्पित कर, कुमकुम, चन्दन, मोली, अक्षत चढ़ाए जाते हैं।
- विशेष नियम – चांद उदय से पहले व्रती को बैठना नहीं चाहिए; खड़े रहकर कथा श्रवण और भजन करना चाहिए।
चांद का महत्व
चंद्रमा को अर्ध्य देने की परंपरा इस व्रत का केंद्र है। मान्यता है कि चांद को अर्ध्य देने से मानसिक शांति, स्वास्थ्य और पारिवारिक सुख की प्राप्ति होती है। जब तक चांद न निकल जाए, व्रती जल भी ग्रहण नहीं करते।
ऊब छठ व्रत कथा
प्राचीन कथा के अनुसार, एक साहूकार और उसकी पत्नी का व्यवहार धार्मिक नियमों के विपरीत था। पत्नी रजस्वला होने पर भी रसोई, पानी भरने और खाना बनाने जैसे कार्य करती थी। मृत्यु के बाद, अगले जन्म में साहूकार बैल और उसकी पत्नी कुतिया बनी।
उनके पुत्र के घर श्राद्ध के दिन खीर में चील से गिरे मृत सांप को देखकर कुतिया ने खीर में मुंह डालकर लोगों को बचा लिया, परंतु बहू ने उसे पीट दिया। रात में बैल और कुतिया ने अपनी पीड़ा साझा की, जो बहू ने सुन ली। पंडित ने ज्योतिष से बताया कि वे उसके माता-पिता हैं और पापों के कारण यह योनि मिली।
पंडित ने उपाय बताया – पुत्री को भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी को ऊब छठ व्रत कर, चांद को अर्ध्य देकर वह पानी बैल और कुतिया पर गिराना होगा। पुत्री ने व्रत कर ऐसा ही किया, जिससे दोनों को मोक्ष मिला।
व्रत के लाभ
- पारिवारिक सुख और संतान की दीर्घायु
- मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार
- पितरों की मुक्ति और पुण्य लाभ
- कृषि और पशुधन में वृद्धि
ऊब छठ व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि एक जीवन शैली है, जो अनुशासन, पवित्रता और पारिवारिक जिम्मेदारियों को मजबूत करता है। यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि कर्म और आचरण के परिणाम अगले जन्म तक प्रभाव डाल सकते हैं, और सही समय पर किए गए पुण्य कर्म मुक्ति का मार्ग खोल सकते हैं।



