हिंदू पंचांग में त्रयोदशी तिथि का अत्यंत शुभ और पवित्र महत्व माना गया है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना करने से व्यक्ति के जीवन में शांति, सुख, समृद्धि और मानसिक संतुलन आता है। जब यह त्रयोदशी तिथि सोमवार के दिन पड़ती है, तब इसे सोम प्रदोष व्रत कहा जाता है।
यह व्रत विशेष रूप से भगवान शिव के प्रसन्नता हेतु किया जाता है और इसे चंद्र दोष, मानसिक अशांति तथा जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति प्रदान करने वाला व्रत माना जाता है।
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि इस वर्ष 3 नवंबर 2025 (सोमवार) को पड़ रही है। इस दिन का व्रत रखने और प्रदोष काल में पूजा करने से भगवान शिव भक्तों पर विशेष कृपा बरसाते हैं और सभी दुखों का अंत करते हैं।
तिथि व मुहूर्त
- व्रत तिथि: 3 नवंबर 2025 (सोमवार)
- त्रयोदशी तिथि प्रारंभ: 3 नवंबर, सुबह 5:07 बजे
- त्रयोदशी तिथि समाप्त: 4 नवंबर, सुबह 2:05 बजे
- प्रदोष काल पूजा मुहूर्त: शाम 5:34 बजे से रात 8:11 बजे तक (कुल अवधि – लगभग 2 घंटे 36 मिनट)
यह काल भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे शुभ समय माना गया है।
सोम प्रदोष व्रत का महत्व
सोमवार को आने वाला प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष कृपा प्राप्त करने का दिव्य अवसर होता है। शास्त्रों में कहा गया है कि—
“प्रदोषे पूजितो शंभुः सर्वदुःखविनाशनः।”
अर्थात, जो भक्त प्रदोष काल में शिव की पूजा करता है, उसके सभी दुखों का नाश होता है।
यह व्रत विशेष रूप से चंद्र दोष से मुक्ति, मानसिक शांति और पारिवारिक सौहार्द के लिए किया जाता है। इस दिन व्रत करने से पारिवारिक कलह समाप्त होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
प्रदोष व्रत की पूजा विधि
- प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ, हल्के वस्त्र धारण करें।
- “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करते हुए व्रत का संकल्प लें।
- प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद से रात होने तक) में पुनः स्नान करें।
- पूजा स्थल को शुद्ध करें और भगवान शिव तथा माता पार्वती की प्रतिमा या शिवलिंग स्थापित करें।
- शिवलिंग का पंचामृत (दूध, दही, शहद, घी, गंगाजल) से रुद्राभिषेक करें।
- भगवान को बिल्वपत्र, धतूरा, भांग, चंदन और शमी पत्र अर्पित करें।
- दीपक जलाकर धूप-दीप करें, फिर प्रदोष व्रत की कथा सुनें।
- “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का 108 बार जप करें।
- पूजन के बाद आरती करें और प्रसाद का वितरण करें।
सोम प्रदोष व्रत कथा
प्राचीन कथा के अनुसार, एक बार एक निर्धन ब्राह्मण हर सोमवार को भगवान शिव की आराधना करता था। एक बार उसने त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष काल में व्रत किया और भगवान शिव से धन और संतान का वरदान मांगा। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने स्वयं प्रकट होकर उसे दीर्घायु, सुखी परिवार और अपार धन का आशीर्वाद दिया।
तब से यह माना जाने लगा कि सोम प्रदोष व्रत करने से भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और उसे सांसारिक व आध्यात्मिक सुख प्राप्त होता है।
ज्योतिषीय महत्व
सोम प्रदोष व्रत विशेष रूप से चंद्र दोष को शमन करने वाला व्रत माना गया है। जिन लोगों की कुंडली में चंद्रमा अशुभ स्थिति में होता है —
- उन्हें मानसिक तनाव, अस्थिरता, और भावनात्मक उतार-चढ़ाव झेलने पड़ते हैं।
- ऐसे लोग यदि सोम प्रदोष व्रत रखकर भगवान शिव की आराधना करें, तो चंद्रमा मजबूत होता है।
साथ ही, दूध, दही, सफेद वस्त्र और सफेद पुष्पों का दान करने से चंद्र दोष का प्रभाव समाप्त होता है और मन में शांति आती है।
सोम प्रदोष का विशेष फल
- चंद्र दोष से मुक्ति और मानसिक संतुलन प्राप्त होता है।
- संतानहीन दंपत्तियों को संतान सुख प्राप्त होता है।
- पारिवारिक जीवन में प्रेम और सौहार्द बढ़ता है।
- आर्थिक बाधाएं दूर होती हैं और सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है।
- जीवन में धैर्य, शांति और भक्ति का संचार होता है।
आध्यात्मिक लाभ
सोम प्रदोष व्रत केवल भौतिक सुख नहीं देता, बल्कि यह व्यक्ति को आत्मिक रूप से भी सशक्त बनाता है। यह व्रत मन, वाणी और कर्म को शुद्ध करता है और अहंकार का क्षय करता है। भगवान शिव की उपासना से व्यक्ति “मृत्यु भय” से मुक्त होता है और मोक्ष मार्ग पर अग्रसर होता है।
उपाय
सोम प्रदोष व्रत के दिन एक दीपक जलाकर शिवलिंग के बाएं ओर रखें और “ॐ सोमाय नमः” का जाप करें। इसके बाद दूध, चावल और शक्कर का दान करें। ऐसा करने से चंद्रमा मजबूत होता है और मन में स्थिरता आती है।
सोम प्रदोष व्रत भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का एक अद्भुत अवसर है। इस दिन यदि श्रद्धा और भक्ति से व्रत रखा जाए, तो व्यक्ति के सभी दुख दूर होते हैं, मन शांत होता है और जीवन में दिव्यता का संचार होता है। यह व्रत न केवल आध्यात्मिक उत्थान का प्रतीक है, बल्कि यह मानव जीवन को सदाचार, संयम और आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करता है।



