प्रकृति के अंग
चिड़िया कौआ,मैना,तोता सब है प्रकृति के ही अंग,
इनकी रक्षा करने में हम आज हो रहे बहुत अपंग ।
सोचो जब अपना बचपन था कैसी थी चिड़ियों की डार,
घने-घने थे वृक्ष और पंछी रहते उनमें कई हजार,
कहाँ रहे अब हरे वृक्ष, कहाँ उठती अब देख तरंग,
चिड़िया,कौवे,मैना,तोता सब है प्रकृति के ही अंग ।
दौड़ा करते थे जुगनू,तितली के पीछे हम अक्सर,
आज किताबों में ही उनकी फोटो देखो जी भर कर,
स्वर्ग से आई परियों जैसे परों में हो सुन्दर रंग,
चिड़िया,कौवे,मैना,तोता सब हैं प्रकृति के ही अंग ।
तालाबों में खिला करते थे,कमल बहुत ही सुन्दर,
बचे नहीं तालाब कमल के नाम पे बस है कीचड़,
काँटों की भरपूर फसल है पर नहीं गुलाब का संग,
चिड़िया,कौवे,तोता,मैना सब है प्रकृति के ही अंग ।
लेखिका
श्रीमती प्रभा पांडेय जी
” पुरनम “
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