पोला पिठोरी कुशाग्रहणी अमावस्या 2025: पितृ तर्पण, कुशाग्रहणी और 64 योगिनियों की पूजा का महत्व | जानिए पूरी जानकारी | 2YoDo विशेष

भाद्रपद मास की अमावस्या को पूरे भारतवर्ष में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे कुशाग्रहणी अमावस्या के नाम से जाना जाता है, जबकि दक्षिण भारत में इसे पोलाला अमावस्या कहा जाता है। इस दिन पितरों का तर्पण, श्राद्ध, दान-पुण्य और धार्मिक स्नान का अत्यधिक महत्व माना गया है।

पिठोरी अमावस्या 2025 की तिथि

  • अमावस्या तिथि प्रारंभ: 22 अगस्त 2025, दोपहर 11:57 बजे
  • अमावस्या तिथि समाप्त: 23 अगस्त 2025, सुबह 11:37 बजे

चूंकि 22 अगस्त को अमावस्या मध्यकाल में रहेगी और उदया तिथि 23 अगस्त को होगी, इसलिए 22 अगस्त को पिठोरी अमावस्या तथा 23 अगस्त को कुशाग्रहणी अमावस्या के रूप में मान्य होगी।

पिठोरी अमावस्या का महत्व

पिठोरी अमावस्या पर पितृ तर्पण और श्राद्ध करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और वे अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं। मान्यता है कि इस दिन पीपल के वृक्ष की पूजा करने से दुख-दर्द समाप्त होते हैं और शनि दोष से मुक्ति मिलती है। गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करने से पाप नष्ट होते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है।

कुशाग्रहणी अमावस्या का महत्व

23 अगस्त की सूर्योदय कालीन अमावस्या को कुशाग्रहणी अमावस्या कहा जाता है। इस दिन घर में कुश (विशेष घास) लाने की परंपरा है।

  • जिनके माता-पिता का निधन हो चुका है, वे कुश इकट्ठा करते हैं।
  • यही कुश पूरे वर्ष पितृ पूजन और श्राद्ध में काम आती है।
  • साल के अन्य दिनों में कुश उखाड़ना वर्जित माना गया है।
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64 योगिनियों की पूजा

कथाओं के अनुसार, भाद्रपद अमावस्या पर मां पार्वती ने 64 योगिनियों के साथ मिलकर भगवान गणेश की पूजा की थी।

  • “पिठोरी” शब्द का अर्थ है – आटे से बनी मूर्तियाँ।
  • इस दिन महिलाएं आटे से 64 योगिनियों की प्रतिमाएं बनाकर उनकी पूजा करती हैं।
  • यह पूजा संतान सुख, सौभाग्य, समृद्धि और जीवन की बाधाओं से मुक्ति प्रदान करती है।

पूजन विधि

  1. प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. सूर्य देव को अर्घ्य दें और “ॐ पितृभ्यः नमः” मंत्र के साथ पितरों को जल अर्पित करें।
  3. पूजा स्थल पर घी का दीपक जलाएं और व्रत का संकल्प लें।
  4. महिलाएं बच्चों के नाम से व्रत रखती हैं ताकि संतान का जीवन सुखमय रहे।
  5. पीपल और शनि देव की पूजा करने का भी विशेष महत्व है।

क्षेत्रीय मान्यता

  • उत्तर भारत : इसे कुशाग्रहणी अमावस्या कहा जाता है।
  • दक्षिण भारत : इसे पोलाला अमावस्या कहा जाता है और यहां भी संतान सुख एवं पितृ शांति हेतु पूजा की जाती है।

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