हिंदू धर्म में श्राद्ध कर्म पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और आत्मा-शांति का सर्वोच्च माध्यम माना जाता है। इसी परंपरा में एक विशेष तिथि ऐसी भी है जो अकाल मृत्यु, दुर्घटनात्मक मृत्यु और अप्राकृतिक रूप से मृत आत्माओं को मोक्ष प्रदान करने के लिए समर्पित है— यह तिथि है पिशाचमोचन श्राद्ध।
मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर मनाया जाने वाला यह विशेष श्राद्ध कर्म, प्रेतबाधा, पितृदोष और अशांत आत्माओं को शांति देने का अत्यंत प्रभावी उपाय माना गया है। उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों — विशेषकर वाराणसी के पिशाचमोचन कुंड — में इसका अत्यधिक धार्मिक महत्व है। हजारों श्रद्धालु इस दिन अपने दिवंगत परिजनों की सद्गति हेतु तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करते हैं।
पिशाचमोचन श्राद्ध 2025 तिथि
3 दिसंबर 2025 (बुधवार) मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष चतुर्दशी, यह तिथि विशेष रूप से उन आत्माओं के लिए मानी जाती है जिनकी—
- अकाल मृत्यु
- दुर्घटना
- आत्महत्या
- विष, डूबने, विद्युताघात इत्यादि अप्राकृतिक कारणों से मृत्यु हुई हो
शास्त्रों में कहा गया है कि ऐसी आत्माएँ अक्सर अशांत रहती हैं और पिशाच योनि में भटक सकती हैं। इन्हें सद्गति देने का श्रेष्ठ दिन— पिशाचमोचन श्राद्ध।
पिशाचमोचन श्राद्ध का आध्यात्मिक महत्व
पिशाचमोचन श्राद्ध केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि—
- आत्माओं को मोक्ष दिलाने का दिव्य माध्यम है
- पितरोदय और पितृ-शांति का शक्तिशाली विधान है
- पितृदोष को समाप्त करने वाला तिथि विशेष है
धार्मिक मान्यता:
- जो श्राद्ध इस दिन किया जाता है, वह अक्षय माना जाता है।
- इसका फल अनेक गुना बढ़कर पितरों तक पहुँचता है और वे दीर्घकाल तक प्रसन्न रहते हैं।
इसके लाभ:
- अशांत आत्माओं की मुक्ति
- पितृदोष का निवारण
- जीवन में अवरोधों का समाप्त होना
- घर में शांति और बरकत
- व्यवसाय और धन–प्राप्ति में वृद्धि
- अनचाहे भय, स्वप्न और बाधाओं का नाश
कहा जाता है— पिशाचमोचन श्राद्ध करने से प्रेत योनि में फंसी आत्माएँ तुरंत मुक्त होती हैं और स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान करती हैं।
पिशाचमोचन श्राद्ध क्यों किया जाता है?
हर आत्मा शांति चाहती है। परन्तु जिनकी मृत्यु— समय से पहले अचानक हिंसा भयावह परिस्थितियों में होती है, वे अकसर संसार में भटकती हैं।
ऐसी आत्माएँ—
- घर-परिवार को बाधाएँ देती हैं
- स्वप्न में दिखाई देती हैं
- परिवार में अवरोध, रोग और अशांति पैदा कर सकती हैं
इसीलिए यह श्राद्ध— प्रेतयोनि → पितृयोनि → मोक्ष मार्ग की दिशा में आत्मा को आगे बढ़ाता है।
वाराणसी का पिशाचमोचन कुंड — मोक्ष का द्वार
वाराणसी में स्थित पिशाचमोचन कुंड का उल्लेख अनेक ग्रंथों में मिलता है। मान्यता है कि—
- यहां तर्पण करने से पिशाच बाधा तुरंत दूर होती है
- अकाल मृत आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है
- कुंड का जल पितरों तक सीधे पहुंचता है
हर वर्ष हजारों श्रद्धालु यहाँ तर्पण और पिंडदान करने आते हैं।
पिशाचमोचन श्राद्ध विधि — चरण-दर-चरण विस्तृत प्रक्रिया
प्रातःकाल स्नान और संकल्प
- सूर्योदय से पहले स्नान करें
- स्वच्छ सफेद या हल्के रंग के वस्त्र पहनें
- हाथ में शुद्ध जल लेकर संकल्प करें
संकल्प में उस व्यक्ति का नाम लिया जाता है जिसकी शांति के लिए श्राद्ध किया जा रहा है।
कुशा आसन और दक्षिण दिशा
- कुशा बिछाकर बैठें
- चेहरा दक्षिण दिशा की ओर रखें
- पवित्र पात्र में जल भरें
दक्षिण दिशा पितरों की दिशा मानी जाती है।
तर्पण और जल अर्पण
ताम्बे या पीतल के पात्र में:
- दूध
- दही
- घी
- मधु
- शहद
- अक्षत
- कुमकुम
- तिल
- कुश
मिलाकर यह जल भूमि पर पितरों को अर्पित किया जाता है।
पिंडदान
यदि संभव हो तो पिंडदान अवश्य करें। चावल, तिल और घी से बने पिंड— अशांत आत्मा को स्थिरता प्रदान करते हैं।
पीपल पूजन
पीपल वृक्ष पर जल अर्पित करना आवश्यक है। यह पितरों का प्रतीक माना जाता है।
दान-पुण्य
इस दिन दान अत्यंत शुभ माना गया है:
- वस्त्र
- घी
- अनाज
- भोजन
- कंबल
- धन
- दीपदान
इनका दान पितृदोष निवारण में अत्यंत प्रभावी है।
भगवत कथा और जप
- विष्णु सहस्रनाम
- रामनाम
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” जप करने से अनुष्ठान पूर्ण होता है।
पिशाचमोचन श्राद्ध के लाभ
यह श्राद्ध करने से—
- पितरों को शांति मिलती है
- प्रेतयोनि से मुक्ति
- घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर
- परिवार में सुख-शांति
- पितृदोष का निवारण
- मानसिक, आर्थिक और पारिवारिक संकट समाप्त
- अकाल मृत्यु के भय से रक्षा
यह तिथि अक्षय श्राद्ध मानी जाती है— यानी एक बार किया गया श्राद्ध, लंबे समय तक फल देता है।



