भगवान भोलेनाथ की आराधना का सबसे बड़ा पर्व महाशिवरात्रि हर शिवभक्त के लिए अत्यंत पावन और विशेष होता है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम और साधना की परम रात्रि है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव समस्त शिवलिंगों में विशेष रूप से विराजमान होते हैं और सच्चे मन से की गई उपासना से शीघ्र प्रसन्न होकर भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाने वाला महाशिवरात्रि का पर्व शिवभक्तों के लिए वर्ष का सबसे पावन अवसर होता है। यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मजागरण, संयम, साधना और शिवत्व को जीवन में उतारने का संकल्प है। मान्यता है कि इसी रात्रि मध्यकाल में भगवान शंकर रुद्र रूप में प्रकट हुए थे और यही वह दिव्य क्षण है जब साधक को शिवकृपा सहज रूप से प्राप्त होती है।
क्यों मनाई जाती है महाशिवरात्रि?
महाशिवरात्रि भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन का महापर्व है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाने वाला यह उत्सव शिव और शक्ति के अभिसरण का प्रतीक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी दिन महादेव और पार्वती का विवाह हुआ था। इसलिए शिवभक्त इस दिन शिव बारात निकालते हैं, रात्रि जागरण करते हैं और श्रद्धा से व्रत रखकर भगवान भोलेनाथ का पूजन करते हैं। कहा जाता है कि इस दिन सच्चे मन से पूजा करने पर शिव अत्यंत शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
अमांत और पूर्णिमांत पंचांग का अंतर
अमांत पंचांग के अनुसार माघ मास की शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है, जबकि पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि माना जाता है। दोनों गणनाओं में तिथि एक ही दिन पड़ती है, केवल मास नाम में अंतर होता है।
महाशिवरात्रि 2026 की तिथि
पंचांग के अनुसार महाशिवरात्रि की चतुर्दशी तिथि 15 फरवरी 2026 की शाम 05:04 बजे से प्रारंभ होकर 16 फरवरी 2026 की शाम 05:34 बजे तक रहेगी। चूंकि 15 फरवरी की रात्रि में चतुर्दशी तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए महाशिवरात्रि का पर्व 15 फरवरी 2026, रविवार को मनाया जाएगा। शिवपूजन का विशेष महत्व रात्रि के चार प्रहरों में माना जाता है।
तिथि: 15 फरवरी 2026, रविवार
निशीथ काल पूजा (सबसे महत्वपूर्ण):
15 फरवरी, रात्रि 12:09 बजे से 16 फरवरी, रात्रि 01:01 बजे तक
यह 51 मिनट का अत्यंत विशेष समय है, जिसे शिवपूजन का सर्वोच्च मुहूर्त माना जाता है।
चार प्रहर की पूजा का विशेष महत्व:
प्रथम प्रहर: 15 फरवरी, शाम 06:11 बजे से रात्रि 09:22 बजे तक
द्वितीय प्रहर: 15 फरवरी, रात्रि 09:23 बजे से 16 फरवरी, रात्रि 12:34 बजे तक
तृतीय प्रहर: 16 फरवरी, रात्रि 12:35 बजे से प्रातः 03:46 बजे तक
चतुर्थ प्रहर: 16 फरवरी, प्रातः 03:46 बजे से 06:59 बजे तक
नीशिथ काल: मध्य रात्रि 12:01 से 01:01 बजे तक
व्रत पारण: 16 फरवरी 2026 को प्रातः 06:33 बजे से 03:10 बजे के मध्य।
महाशिवरात्रि पूजा सामग्री सूची
बेलपत्र, अक्षत, गाय का दूध, पंचामृत, गंगाजल, धतूरा, भांग, मदार के फूल, सफेद पुष्प, शमी पत्र, शक्कर, शहद, इलायची, लौंग, पान के पत्ते, सुपारी, जनेऊ, केसर, इत्र, सफेद चंदन, गन्ने का रस, मौसमी फल, मिठाई या चूरमा का भोग।
महाशिवरात्रि पूजा विधि
- प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लें।
- पूजा स्थान पर स्वच्छ चौकी स्थापित कर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं।
- भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग स्थापित करें।
- कलश में गंगाजल, सुपारी, सिक्का और हल्दी डालकर स्वास्तिक बनाएं।
- घी का दीपक जलाएं और “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करें।
- शिवलिंग का जल, दूध या पंचामृत से अभिषेक करें।
- बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी पत्र और फल अर्पित करें।
- शिवरात्रि कथा का श्रवण कर आरती करें।
- रात्रि जागरण कर भजन-कीर्तन और जप-ध्यान करें।
महाशिवरात्रि की उत्पत्ति और पौराणिक मान्यताएँ
पुराणों में वर्णित है कि इसी रात्रि भगवान शिव अग्निलिंग के रूप में प्रकट हुए थे। इसी दिन उन्होंने तांडव कर तीसरा नेत्र खोला, जिसकी ज्वाला से ब्रह्मांडीय परिवर्तन हुआ। यह घटना शिव की अनंत और निराकार सत्ता का प्रतीक है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। अतः यह पर्व शिव-पार्वती के पावन मिलन का भी प्रतीक है।
महाशिवरात्रि पूजा और अभिषेक
इस दिन शिवलिंग का जल, दूध, दही, शहद, घृत और गंगाजल से अभिषेक किया जाता है। विशेष रूप से बिल्वपत्र, धतूरा, भांग, बेर, अबीर, गुलाल, उम्बी और शमी पत्र अर्पित किए जाते हैं।
मान्यता है कि महाशिवरात्रि पर भोलेनाथ के 108 नामों का उच्चारण करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है।
महाशिवरात्रि की उत्पत्ति से जुड़ी प्रमुख कथाएं
शिव-पार्वती विवाह
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिव और पार्वती का विवाह हुआ था। इसलिए यह दिन दांपत्य सुख और वैवाहिक समृद्धि के लिए विशेष माना जाता है। अविवाहित कन्याएँ योग्य वर की प्राप्ति हेतु और विवाहित महिलाएँ वैवाहिक सुख की कामना से यह व्रत करती हैं।
लिंगोद्भव कथा
पुराणों के अनुसार इस दिन मध्यरात्रि में भगवान शिव अग्निलिंग के रूप में प्रकट हुए थे। ब्रह्मा और विष्णु ने पहली बार शिवलिंग की पूजा की थी। इसलिए इसे शिव के प्राकट्य दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।
सृष्टि का प्रारंभ
पौराणिक मान्यता है कि इसी दिन सृष्टि का आरंभ हुआ और शिव ने ब्रह्मांडीय ऊर्जा के रूप में प्रकट होकर सृजन-चक्र को गति दी।
समुद्र मंथन और नीलकंठ
समुद्र मंथन अमर अमृत का उत्पादन करने के लिए निश्चित थी, लेकिन इसके साथ ही हलाहल नामक विष भी पैदा हुआ था। हलाहल विष में ब्रह्मांड को नष्ट करने की क्षमता थी और इसलिए केवल भगवान शिव इसे नष्ट कर सकते थे। भगवान शिव ने हलाहल नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था। जहर इतना शक्तिशाली था कि भगवान शिव बहुत दर्द से पीड़ित थे और उनका गला बहुत नीला हो गया था। इस कारण से भगवान शिव ‘नीलकंठ’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। उपचार के लिए, चिकित्सकों ने देवताओं को भगवान शिव को रात भर जागते रहने की सलाह दी। इस प्रकार, भगवान भगवान शिव के चिंतन में एक सतर्कता रखी। शिव का आनंद लेने और जागने के लिए, देवताओं ने अलग-अलग नृत्य और संगीत बजाने लगे। जैसे सुबह हुई, उनकी भक्ति से प्रसन्न भगवान शिव ने उन सभी को आशीर्वाद दिया। शिवरात्रि इस घटना का उत्सव है, जिससे शिव ने दुनिया को बचाया। तब से इस दिन, भक्त उपवास करते है
शिकारी की कथा
एक बार पार्वती जी ने भगवान शिवशंकर से पूछा, ‘ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?’ उत्तर में शिवजी ने पार्वती को ‘शिवरात्रि’ के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- ‘एक बार चित्रभानु नामक एक शिकारी था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।’
शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल-वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो विल्वपत्रों से ढका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।
पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुंची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, ‘मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।’ शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई।
कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, ‘हे पारधी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।’ शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, ‘हे पारधी!’ मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान मांग रही हूं। हे पारधी! मेरा विश्वास कर, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं।
मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में बेल-वृक्षपर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृगविनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।
मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, ‘मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।’ उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गया। भगवान शिव की अनुकंपा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा। थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया। देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे। घटना की परिणति होते ही देवी देवताओं ने पुष्प वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए’।
महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व
‘शिव’ शब्द का अर्थ ही ‘कल्याण’ है। यह रात्रि आत्मकल्याण की साधना का अवसर है। उपवास, जागरण और मंत्रजप से मन, वाणी और कर्म की शुद्धि होती है।
स्कंद पुराण के ब्रह्मोत्तर खंड में उल्लेख है कि शिवरात्रि का उपवास और जागरण अत्यंत दुर्लभ और सौ यज्ञों के समान पुण्यदायी है।
इस दिन किया गया जप-ध्यान कई गुना फल देता है। रात्रि के चार प्रहरों में शिवलिंग का अभिषेक करना विशेष फलदायी माना गया है। प्रत्येक प्रहर में अलग-अलग पदार्थों से अभिषेक करने की परंपरा है—जल, दूध, दही, घृत, शहद आदि।
व्रत का वैज्ञानिक और मानसिक लाभ
महाशिवरात्रि प्रायः ऋतु परिवर्तन के समय आती है। इस समय उपवास और हल्का आहार शरीर को विषमुक्त करता है। रात्रि जागरण ध्यान और एकाग्रता को बढ़ाता है। “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप मानसिक तनाव को कम करता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
क्या करें और क्या न करें
• तामसिक भोजन से दूर रहें।
• क्रोध, वाद-विवाद और नकारात्मक विचारों से बचें।
• मन, वाणी और कर्म में संयम रखें।
• शिवभक्ति में निरंतरता बनाए रखें।
महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक संदेश
‘शिव’ का अर्थ है कल्याण। यह रात्रि हमें अपने भीतर के अंधकार को समाप्त कर आत्मप्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देती है।
मानव जीवन पाँच विकारों—काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार—से बंधा हुआ है। जो इन विकारों से मुक्त हो जाता है वही पशुता से ऊपर उठकर “पशुपतिनाथ” के मार्ग पर अग्रसर होता है। भगवान शिव स्वयं इन विकारों से परे हैं, इसलिए उन्हें पशुपतिनाथ कहा गया।
शिव परिवार का अद्भुत संदेश
भगवान शिव का परिवार सामाजिक समरसता का अनूठा प्रतीक है।
शिव के गले में सर्प है और गणेश का वाहन चूहा, जो सर्प का आहार है, फिर भी दोनों साथ रहते हैं। कार्तिकेय का वाहन मोर है, जो सर्प का भक्षण करता है, परंतु परिवार में वैर नहीं। शिव का वाहन नंदी बैल है और पार्वती का वाहन सिंह, जो स्वभावतः विरोधी हैं, किंतु शिव परिवार में प्रेमपूर्वक रहते हैं।
यह संदेश देता है कि समाज में भिन्न विचार और प्रवृत्तियाँ होते हुए भी परस्पर सौहार्द और सम्मान बनाए रखना ही सच्चा धर्म है।
गंगा, चंद्रमा और शीतलता का संदेश
भगवान शिव जटाओं में गंगा और मस्तक पर चंद्रमा धारण करते हैं। दोनों शीतलता के प्रतीक हैं। यह हमें सिखाता है कि जीवन की विषम परिस्थितियों में भी मस्तिष्क को शांत रखना चाहिए।
जब कोई व्यक्ति समाज उत्थान का कार्य करता है, तो उसे मान और अपमान दोनों मिलते हैं। अपमान हलाहल विष के समान है, जिसे केवल शीतल मस्तिष्क वाला ही धारण कर सकता है। शिव ने हलाहल को कंठ में धारण कर यह संदेश दिया कि समाजहित के लिए विष भी स्वीकार करना पड़े तो पीछे न हटें।
उपेक्षितों के प्रति शिव का दृष्टिकोण
शिव की बारात में देव, दानव, भूत, प्रेत, नाग और गण—सभी सम्मिलित होते हैं। वे समाज के उपेक्षित और वंचित वर्ग को भी अपने साथ स्थान देते हैं। इसीलिए वे पतित पावन कहलाते हैं।
महाशिवरात्रि हमें यह प्रेरणा देती है कि समाज के वंचित, अभावग्रस्त और उपेक्षित लोगों को अपनाना ही सच्ची शिवभक्ति है।
रात्रि जागरण का महत्व
संतों के अनुसार ‘जागरण’ केवल रातभर जागना नहीं, बल्कि इंद्रियों पर नियंत्रण और आत्मा को जागृत करना है। यह समय साधना, मंत्रजप और आत्मचिंतन के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
शिवपूजन में छः वस्तुओं का महत्व
- बेलपत्र – शिव के क्रोध को शांत करने का प्रतीक।
- चंदन – शीतलता और शुभता का प्रतीक।
- फल-फूल – कृतज्ञता का भाव।
- धूप – दुःख और कष्टों का नाश।
- दीप – अज्ञान रूपी अंधकार का नाश।
- पान पत्ता – संतोष और आभार का प्रतीक।
आरती
भगवान गंगाधर की आरती
- ॐ जय गंगाधर जय हर जय गिरिजाधीशा।
- त्वं मां पालय नित्यं कृपया जगदीशा॥ हर…॥
- कैलासे गिरिशिखरे कल्पद्रमविपिने।
- गुंजति मधुकरपुंजे कुंजवने गहने॥
- कोकिलकूजित खेलत हंसावन ललिता।
- रचयति कलाकलापं नृत्यति मुदसहिता ॥ हर…॥
- तस्मिंल्ललितसुदेशे शाला मणिरचिता।
- तन्मध्ये हरनिकटे गौरी मुदसहिता॥
- क्रीडा रचयति भूषारंचित निजमीशम्।
- इंद्रादिक सुर सेवत नामयते शीशम् ॥ हर…॥
- बिबुधबधू बहु नृत्यत नामयते मुदसहिता।
- किन्नर गायन कुरुते सप्त स्वर सहिता॥
- धिनकत थै थै धिनकत मृदंग वादयते।
- क्वण क्वण ललिता वेणुं मधुरं नाटयते ॥हर…॥
- रुण रुण चरणे रचयति नूपुरमुज्ज्वलिता।
- चक्रावर्ते भ्रमयति कुरुते तां धिक तां॥
- तां तां लुप चुप तां तां डमरू वादयते।
- अंगुष्ठांगुलिनादं लासकतां कुरुते ॥ हर…॥
- कपूर्रद्युतिगौरं पंचाननसहितम्।
- त्रिनयनशशिधरमौलिं विषधरकण्ठयुतम्॥
- सुन्दरजटायकलापं पावकयुतभालम्।
- डमरुत्रिशूलपिनाकं करधृतनृकपालम् ॥ हर…॥
- मुण्डै रचयति माला पन्नगमुपवीतम्।
- वामविभागे गिरिजारूपं अतिललितम्॥
- सुन्दरसकलशरीरे कृतभस्माभरणम्।
- इति वृषभध्वजरूपं तापत्रयहरणं ॥ हर…॥
- शंखनिनादं कृत्वा झल्लरि नादयते।
- नीराजयते ब्रह्मा वेदऋचां पठते॥
- अतिमृदुचरणसरोजं हृत्कमले धृत्वा।
- अवलोकयति महेशं ईशं अभिनत्वा॥ हर…॥
- ध्यानं आरति समये हृदये अति कृत्वा।
- रामस्त्रिजटानाथं ईशं अभिनत्वा॥
- संगतिमेवं प्रतिदिन पठनं यः कुरुते।
- शिवसायुज्यं गच्छति भक्त्या यः श्रृणुते ॥ हर…॥
त्रिगुण शिवजी की आरती
- ॐ जय शिव ओंकारा,भोले हर शिव ओंकारा।
- ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अर्द्धांगी धारा ॥ ॐ हर हर हर महादेव…॥
- एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
- हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
- दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।
- तीनों रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
- अक्षमाला बनमाला मुण्डमाला धारी।
- चंदन मृगमद सोहै भोले शशिधारी ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
- श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
- सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
- कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता।
- जगकर्ता जगभर्ता जगपालन करता ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
- ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
- प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
- काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी।
- नित उठि दर्शन पावत रुचि रुचि भोग लगावत महिमा अति भारी ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
- लक्ष्मी व सावित्री, पार्वती संगा ।
- पार्वती अर्धांगनी, शिवलहरी गंगा ।। ॐ हर हर हर महादेव..।।
- पर्वत सौहे पार्वती, शंकर कैलासा।
- भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा ।। ॐ हर हर हर महादेव..।।
- जटा में गंगा बहत है, गल मुंडल माला।
- शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला ।। ॐ हर हर हर महादेव..।।
- त्रिगुण शिवजीकी आरती जो कोई नर गावे।
- कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥
- ॐ जय शिव ओंकारा भोले हर शिव ओंकारा
- ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा ।। ॐ हर हर हर महादेव….।।
महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आध्यात्मिक उन्नयन की रात्रि है। यह अवसर है जब भक्त शिव की कृपा से अपने भीतर के अज्ञान, भय और अहंकार को त्यागकर शांति और संतुलन की ओर अग्रसर होता है। श्रद्धा, संयम और जागरण के साथ मनाया गया यह व्रत जीवन में नई ऊर्जा और सकारात्मकता का संचार करता है।



