कार्तिक माह का रोहिणी व्रत जैन धर्म के साथ-साथ हिंदू धर्म में भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह व्रत उस दिन किया जाता है जब रोहिणी नक्षत्र पड़ता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस नक्षत्र का संबंध चंद्रमा से होता है, जो शांति, सौम्यता, समृद्धि और मानसिक स्थिरता का प्रतीक है। यही कारण है कि इस व्रत को करने वाले व्यक्ति के जीवन में धन, स्वास्थ्य और सौभाग्य की वृद्धि होती है।
रोहिणी व्रत का आध्यात्मिक महत्व
रोहिणी व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और संयम का प्रतीक माना जाता है। जैन ग्रंथों के अनुसार, इस व्रत को रखने से व्यक्ति अपने कर्मबंधनों से मुक्ति प्राप्त करता है। यह व्रत महिलाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे उन्हें अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
हिंदू मत के अनुसार, इस व्रत को करने से व्यक्ति के जीवन से दरिद्रता, क्लेश और मानसिक अशांति समाप्त होती है। रोहिणी नक्षत्र चंद्रमा का प्रिय नक्षत्र है, और चंद्रमा मन का कारक होने के कारण यह व्रत मन की स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।
कार्तिक रोहिणी व्रत 2025 की तिथि और समय
पंचांग के अनुसार, कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को यह व्रत किया जाता है।
- पंचमी तिथि प्रारंभ: 10 अक्टूबर 2025, शुक्रवार, शाम 7:38 बजे
- पंचमी तिथि समाप्त: 11 अक्टूबर 2025, शनिवार, शाम 4:43 बजे
- चंद्रोदय का समय: रात 9:10 बजे
इस प्रकार उदया तिथि के अनुसार, कार्तिक रोहिणी व्रत 11 अक्टूबर 2025 (शनिवार) को रखा जाएगा।
चंद्र पूजन का विशेष महत्व
रोहिणी व्रत में चंद्रमा की पूजा का अत्यंत विशेष महत्व बताया गया है। चंद्रदेव को जल अर्पण करने से मानसिक तनाव दूर होता है और मन में शांति आती है।
इस दिन महिलाएं रात में चंद्रमा का दर्शन कर अर्घ्य प्रदान करती हैं। कहा जाता है कि चंद्रमा के दर्शन से पापों का क्षय होता है और व्यक्ति को मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं।
रोहिणी व्रत की विधिवत पूजा प्रक्रिया
- प्रातःकाल स्नान और संकल्प: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगाजल मिले जल से स्नान करें। फिर भगवान वासुपूज्य का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
- सूर्य अर्घ्य: स्नान के बाद सूर्य भगवान को जल अर्पित करें और अपने जीवन में प्रकाश और शांति की कामना करें।
- पूजन स्थल की तैयारी: पूजा स्थल को स्वच्छ करें और उस पर लाल या पीले वस्त्र बिछाकर भगवान वासुपूज्य की प्रतिमा स्थापित करें।
- पूजा सामग्री अर्पण करें: फल, पुष्प, अक्षत, धूप, दीपक, गंध, नैवेद्य और दूर्वा अर्पित करें।
- संध्या पूजन और चंद्र अर्घ्य: सूर्यास्त के पश्चात चंद्रदेव को जल, चावल और फूल अर्पित करें।
- व्रत पारण: अगले दिन पूजा-पाठ करने के बाद व्रत का पारण करें और गरीबों में अन्न-दान या वस्त्र-दान अवश्य करें।
कार्तिक रोहिणी व्रत का महत्व
- अखंड सौभाग्य की प्राप्ति: विवाहित महिलाओं को इस व्रत से सौभाग्य, पति की लंबी आयु और वैवाहिक सुख की प्राप्ति होती है।
- पापों से मुक्ति: यह व्रत व्यक्ति के पाप कर्मों को नष्ट कर आत्मिक शुद्धि प्रदान करता है।
- समृद्धि और सुख का आगमन: घर में आर्थिक स्थिरता, धन-धान्य और खुशहाली आती है।
- कर्मबंधन से मुक्ति: जैन मत में इसे मोक्ष की दिशा में एक कदम माना गया है, जो आत्मा को कर्मबंधन से मुक्त करता है।
पालन करने योग्य नियम
- व्रत के दिन संपूर्ण शुद्धता और स्वच्छता का पालन करें।
- सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करें।
- तीन, पांच या सात वर्षों तक लगातार यह व्रत करने की परंपरा है।
- व्रत के बाद पारण अनुष्ठान अवश्य करें।
- क्रोध, द्वेष, असत्य भाषण और हिंसा से दूर रहें।
धार्मिक मान्यता
जैन शास्त्रों में कहा गया है —
“रोहिण्यां च व्रतं कुर्याद् वै वासुपूज्यप्रसादतः।
सर्वपापक्षयो तस्य स्यात् मुक्तिर्वा सुलभा भवेत्॥”
इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति भगवान वासुपूज्य की कृपा से रोहिणी व्रत करता है, उसके सभी पाप नष्ट होते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
कार्तिक माह का रोहिणी व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्थान और आत्म-संतुलन का प्रतीक है। यह व्रत करने से व्यक्ति अपने जीवन के नकारात्मक प्रभावों से मुक्त होकर शांति, समृद्धि और सुख प्राप्त करता है।
जो भी श्रद्धालु पूर्ण भक्ति भाव से इस व्रत को करते हैं, उनके जीवन में सकारात्मकता, सौभाग्य और सफलता का प्रकाश सदैव बना रहता है।



