दुनिया का निर्माण विविधताओं से हुआ है—धर्म, जाति, भाषा, संस्कृति, विचार, मान्यताएँ, रहन-सहन और जीवनशैली में विविधता। ऐसे विश्व में शांति तभी सम्भव है जब इंसानों के भीतर सहिष्णुता, धैर्य, उदारता और सहनशीलता हो। ठीक इसी उद्देश्य के लिए हर वर्ष 16 नवंबर को पूरी दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय सहिष्णुता दिवस मनाया जाता है।
आज का समय तेज़ गति, तनाव, प्रतिस्पर्धा और असहिष्णुता से भरा हुआ है। लोग जल्दी गुस्सा हो जाते हैं, छोटी-छोटी बातों पर हिंसा, विवाद और द्वेष पनपने लगता है। ऐसे माहौल में सहिष्णुता केवल एक गुण नहीं, बल्कि मानवता के अस्तित्व का आधार बन गई है।
यही कारण है कि आज का दिन दुनियाभर के लोगों को याद दिलाता है कि—
“यदि हम चाहते हैं कि भविष्य सुरक्षित हो, तो हमें सहिष्णुता के बीज आज ही बोने होंगे।”
अंतर्राष्ट्रीय सहिष्णुता दिवस का इतिहास
अंतर्राष्ट्रीय सहिष्णुता दिवस का इतिहास संयुक्त राष्ट्र और UNESCO के महत्वपूर्ण प्रयासों से जुड़ा है।
1995 में UNESCO ने अपना 50वाँ स्थापना दिवस मनाते हुए “सहिष्णुता वर्ष” घोषित किया।
इसी वर्ष “Declaration of Principles on Tolerance” भी अपनाया गया।
इस घोषणा में कहा गया था कि—
- सहिष्णुता का अर्थ केवल बर्दाश्त करना नहीं बल्कि सम्मान देना है
- हर व्यक्ति को अपनी बात कहने, अपने विचार रखने और स्वतंत्र रूप से जीने का अधिकार है
- विविधता मानव समाज की शक्ति है, कमजोरी नहीं
UN General Assembly ने 1996 में 16 नवंबर को “International Day for Tolerance” घोषित किया।
इस प्रकार हर वर्ष यह दिन दुनिया भर में शांति, प्रेम, सम्मान और धैर्य का संदेश लेकर आता है।
मदनजीत सिंह पुरस्कार — सहिष्णुता और अहिंसा के लिए सर्वोच्च सम्मान
इस दिवस की खास बात यह है कि UNESCO हर दो वर्ष में Madan Jeet Singh Prize for the Promotion of Tolerance and Non-Violence देता है।
पुरस्कार की विशेषताएँ:
- राशि: 1 लाख अमेरिकी डॉलर
- दिया जाता है:
- कला
- शिक्षा
- विज्ञान
- संस्कृति
- संचार
में सहिष्णुता और अहिंसा को बढ़ावा देने वाले लोगों को
यह पुरस्कार भारत के प्रसिद्ध लेखक, दार्शनिक और राजनयिक मदनजीत सिंह की स्मृति में दिया जाता है, जो शांति और अहिंसा के समर्थक थे।
सहिष्णुता का वास्तविक अर्थ क्या है?
सहिष्णुता केवल किसी की बात “सहन” करना नहीं है।
शास्त्र, मनोविज्ञान और आधुनिक समाज तीनों मिलकर इसे इस प्रकार परिभाषित करते हैं:
सहिष्णुता का मतलब है
- विविधताओं को सम्मान देना
- दूसरे के विचारों को समझना
- किसी की आस्था या सोच पर आक्रमण न करना
- शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व
- मन में धैर्य, संयम और करुणा रखना
सहनशीलता क्यों जरूरी है?
- समाज में शांति बनी रहती है
- विवाद कम होते हैं
- परिवारों में प्रेम बढ़ता है
- देश में सद्भाव और विकास आता है
- मानवता का अस्तित्व सुरक्षित रहता है
आज के समय में जहाँ तेज़-तर्रार जीवनशैली लोगों को अधीर बना रही है, वहाँ सहिष्णुता केवल एक गुण नहीं बल्कि अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है।
आधुनिक समय में असहिष्णुता क्यों बढ़ रही है?
आज का युग पहले से कहीं अधिक तकनीकी, प्रतिस्पर्धात्मक और तेज़ गति वाला है।
इसके कारण—
- तनाव बढ़ा
- गलतफहमी बढ़ी
- सहनशक्ति घटी
- क्रोध बढ़ा
- सोशल मीडिया पर नफरत फैलने लगी
घर, दफ्तर, समाज, राजनीति और शिक्षा—हर जगह लोग जल्दी विवाद में पड़ जाते हैं। यही वजह है कि सहिष्णुता का महत्व अब पहले से अधिक बढ़ गया है।
अंतर्राष्ट्रीय सहिष्णुता दिवस क्यों मनाना जरूरी है?
हिंसा और कट्टरता को कम करने के लिए
आज विश्व में संघर्ष, युद्ध, जातिगत भेदभाव और धार्मिक तनाव बढ़ रहा है।
सहिष्णुता ही इन समस्याओं का समाधान है।
विविधता को स्वीकार करने के लिए
हर इंसान एक-दूसरे से अलग है—और यही सुंदर है।
सहिष्णुता हमें यह सिखाती है कि:
“अंतर ही सौंदर्य है।”
समाज में शांति स्थापित करने के लिए
सहिष्णुता शांति का बीज है।
जहाँ सहिष्णुता होती है, वहाँ युद्ध नहीं होता।
युवा पीढ़ी को जागरूक करने के लिए
बच्चों और युवाओं को सहनशीलता, धैर्य और सम्मान सिखाना अत्यंत आवश्यक है ताकि भविष्य सुरक्षित रहे।
सहिष्णुता मानवाधिकारों का आधार है—क्योंकि हर किसी को स्वतंत्र रूप से जीने का अधिकार है।
सहिष्णुता हमारे जीवन में कैसे आए? सरल उपाय
- धैर्य विकसित करें चीज़ों को तुरंत प्रतिक्रिया न दें।
- सुनना सीखें दूसरे की बात बिना बीच में टोके सुनें।
- विविधताओं का सम्मान करें किसी की भाषा, धर्म या संस्कृति पर तंज न कसें।
- खुद को शांत रखें क्रोध और तनाव सहिष्णुता के सबसे बड़े दुश्मन हैं।
- प्रेम व करुणा बढ़ाएँ मानवता का सार करुणा ही है।
अंतर्राष्ट्रीय सहिष्णुता दिवस केवल एक औपचारिक दिवस नहीं—बल्कि मानवता का दर्पण है। यह हमें याद दिलाता है कि यदि दुनिया को शांति, सुरक्षा, प्रगति और प्रेम से भरना है, तो सबसे पहले मनुष्य को सहनशील और उदार बनना होगा।
सहिष्णुता वह पुल है, जो दिलों को जोड़ता है और संपूर्ण मानव समाज को एक सूत्र में बाँधता है। जब हर व्यक्ति थोड़ा-सा धैर्य और थोड़ा-सा प्रेम अपने भीतर लाएगा, तभी “वास्तविक सहिष्णुता वाला संसार” संभव होगा।



