गुरु गोबिंद सिंह जी केवल भारत के इतिहास में ही नहीं, बल्कि विश्व के सबसे महान व्यक्तित्वों में से एक माने जाते हैं। वे एक उत्कृष्ट दार्शनिक, लेखक, और कवि के साथ-साथ अद्वितीय रणनीतिकार और असाधारण योद्धा भी थे। वे सिख धर्म के दसवें और अंतिम गुरु हैं, जिन्होंने सिख धर्म के सिद्धांतों को पूरी तरह से स्थापित कर इस पंथ को स्थिरता दी।
गुरु गोबिंद सिंह जयंती कब है?
पंचांग के अनुसार, पौष मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि 05 जनवरी को रात 08:15 बजे प्रारंभ होगी। इस तिथि का समापन 06 जनवरी को दोपहर 06:23 बजे होगा। अतः गुरु गोबिंद सिंह जयंती 06 जनवरी को मनाई जाएगी।
पटना में 10वें गुरु का जन्म हुआ था।
गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म 1666 में पटना में हुआ। वे नौवें सिख गुरु, श्री गुरु तेग बहादुर और माता गुजरी के एकमात्र पुत्र थे, जिनका बचपन का नाम गोबिंद राय था। 11 नवंबर, 1675 को, गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान के पश्चात, वे 10वें गुरु के रूप में स्थापित हुए। इस समय उनकी आयु केवल 9 वर्ष थी।
गुरु गोबिंद सिंह जयंती का महत्व
गुरु गोबिंद सिंह जी ने बैसाखी के अवसर पर खालसा पंथ की नींव रखी थी। उनके जीवनकाल में उन्होंने अनेक साहित्यिक रचनाएं कीं. सिख धर्म के लिए उन्होंने कई महत्वपूर्ण नियम स्थापित किए, जिनका पालन आज भी किया जाता है।
देह शिवा बर मोहे ईहे, शुभ कर्मन ते कभुं न टरूं
न डरौं अरि सौं जब जाय लड़ौं, निश्चय कर अपनी जीत करौं,
अरु सिख हों आपने ही मन कौ इह लालच हउ गुन तउ उचरों,
जब आव की अउध निदान बनै अति ही रन मै तब जूझ मरों।।
~ स्वैया 231, चण्डी दी वार, श्रीदशम ग्रंथ साहिब
हे शिवा (शक्ति) मुझे यह वर दें कि मैं शुभ कर्मों से पीछे न हटूँ।
जब युद्ध करने जाऊँ तो शत्रु से न डरूँ और जीत पक्की करूँ।
अपने मन को सिखा सकूँ कि वह आपके गुणों को याद करने का लालच करे।
जब अंतिम समय आए तब मैं रणक्षेत्र में युद्ध करते हुए मरूँ।
गुरु गोबिंद सिंह जी ने यह शबद 20 वर्ष की आयु में लिखा था। इस शबद में न सिर्फ़ उनकी सीख बल्कि उनका संघर्षपूर्ण जीवन भी छिपा है। कहते हैं जिस सिख धर्म की शुरुआत गुरु नानकदेव जी ने की थी, उसको पूर्ण स्वरूप गुरु गोबिंद सिंह जी ने दिया। आज उनके प्रकाशपर्व (जन्मदिन) पर हम आपको गुरु गोबिंद सिंह जी के संघर्षपूर्ण जीवन की एक झलक देना चाहेंगे:
गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म वर्ष 1666 पटना में हुआ। कहते हैं कि 7 वर्ष की आयु में ही उन्होंने गुरमुखी सीखकर संपूर्ण ‘आदि ग्रंथ’ याद कर लिया था। साथ ही उन्होंने फरसी, ब्रज व संस्कृत भाषा में निपुणता हासिल की और शस्त्रकला भी सीखी।
वर्ष 1675 में गुरु तेग बहादुर ने कश्मीरी पण्डितों तथा अन्य हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाने का विरोध किया। वर्ष 1675 में मुग़ल शासक औरंगजेब ने जब उन्हें इस्लाम कबूलने को कहा, तो गुरु साहब ने सीधे इनकार करते हुए कहा, “सीस कटा सकते हैं केश नहीं” औरंगज़ेब ने सबके सामने बेरहमी से गुरुजी का सिर कटवा दिया। जिसके बाद छोटी उम्र में ही गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु गद्दी को संभाला।
गुरु गद्दी संभालने के बाद उन्होंने लोगों की समस्याओं को निकटता से जाना। उन्होंने देखा कि कैसे पौरुष और वीरता की कमी से आम-आदमी संघर्ष और विद्रोष से घबराता है। जिसके बाद उन्होंने काव्य-रचना और शिक्षण के माध्यम से आमजनमानस में शौर्य और वीरता का संचार करने का संकल्प लिया। वे कहते थे कि युद्ध शस्त्र से नहीं, आत्मबल से जीतते हैं।
उन्होंने देशभर के प्रमुख 52 विद्वानों को आमंत्रण भेजा। और उनसे वेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण इत्यादि ग्रंथों का मूल संस्कृत स्वरूप मँगवाकर उनका ब्रज भाषा में अनुवाद किया। साथ ही, उन प्रसंगों को विशेष महत्व दिया जो शिष्य के भीतर पौरुष जगा सकें। इसी संकलन को आज हम श्रीदशम ग्रंथ साहिब कहते हैं।
जब सेना तैयार करने का समय आया, तो उन्होंने खालसा पंथ की शुरुआत की। खालसा सेना के पहले पाँच सदस्य भी कोई महारथी या यौद्धा नहीं थे। वे गुरु गोबिंद सिंह जी की सभा से उठे वे पाँच लोग थे, जो धर्म के लिए अपना सिर कटवाने को भी तैयार थे। उन पाँचों ने अंधविश्वास व जातिप्रथा जैसी कुरीतियों से ऊपर उठकर, खालसा पंथ को अपना जीवन समर्पित किया। उन्हें आगे चलकर गुरु साहब ने ‘पंज-प्यारे’ की उपमा दी: दया राम (खत्री, लाहौर), धर्मदास (जाट, दिल्ली), मोखमचंद (दर्जी, द्वारिका), हिम्मतचंद (बावर्ची, पुरी) व साहिबचंद (नाई, बिहार)।
41 वर्ष के लघु जीवनकाल में गुरु गोबिंद सिंह जी ने, मुगल व उनके अधीन हिंदू राजाओं के विरुद्ध 21 युद्ध लड़े।पहला युद्ध उन्होंने 16 वर्ष की उम्र में लड़ा। छोटी सेना होने के बावजूद, उन्होंने लगभग सभी युद्धों में जीत हासिल की और धर्म की स्थापना की। लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी था – इन्हीं युद्धों में उन्होंने अपने चारों बेटे, माता गुजरी व अन्य संबंधियों को खोया। युद्धों में मुगल आक्रांताओं की बर्बरता देखने के बाद भी उन्होंने हमेशा यही सिखाया, “जब सभी प्रयास विफल हो जाएँ, सिर्फ़ तभी शस्त्र उठाना उचित है” ।
हर युग के अपने अत्याचार, अंधविश्वास और युद्ध होते हैं।
आज धर्म हार रहा है, विकृत मान्यताओं और अंधविश्वास के नीचे दबकर। आज क्लाइमेट चेंज, जीव-जंतुओं का विलोप जिस तीव्रता से हो रहा, उतना इतिहास में पहले कभी नहीं था। आज इंसान में जितना मानसिक रोग है, उतना पहले कभी नहीं था।