अतुल सुभाष की आत्महत्या के बाद सोशल मीडिया पर जोरदार चर्चा हो रही है। ऐसा लग रहा है जैसे इससे समाज में कोई बड़ा बदलाव आएगा। लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता।
हर साल अतुल सुभाष जैसे दर्जनों मामले सामने आते हैं। अतुल एक सुलझे हुए व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी पीड़ा और आत्महत्या के निर्णय को वीडियो और पत्र के माध्यम से साझा किया। हर पीड़ित के पास अपनी बात कहने का माध्यम नहीं होता। अधिकतर लोग तंत्र से हार मानकर गुमनामी में मर जाते हैं।
तंत्र से लड़ना लगभग असंभव है। अतुल की मौत से कुछ बदलने वाला नहीं है। यह दुखद सत्य है कि वही महिला शायद किसी और से विवाह कर लेगी, अपने बेटे को पालेगी, और पिता के खिलाफ विषैले विचार भरकर उसे बड़ा करेगी। संभवतः कोर्ट उसे अतुल की संपत्ति का भी पूरा हिस्सा दे देगा।
जहां तक जज की बात है, जजों को जज बचा लेते हैं। चाहे वह सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश हों या जिला न्यायालयों में काम करने वाले वकील—हर कोई जानता है कि कोर्ट सिस्टम हर स्तर पर भ्रष्टाचार से भरा हुआ है। इस मामले पर भी कोई चर्चा नहीं होगी।
कुछ ही दिनों में यह विषय खत्म हो जाएगा और लोग किसी नए मुद्दे में व्यस्त हो जाएंगे। यही सच्चाई है।
अतुल से सहानुभूति व्यक्त कर भी क्या होगा? वह तो अब इस दुनिया में नहीं हैं। पर हां, मरने से पहले अगर वह एक-दो लोगों को भी साथ ले जाते, तो शायद उनकी कहानी और जोर से गूंजती। मुझे फिल्म ‘शूल’ का अंतिम दृश्य याद आता है, जहां मनोज बाजपेयी का किरदार तंत्र से मजबूर होकर विधानसभा में विधायक की कनपटी पर बंदूक तान देता है।
हमारा समाज ऐसा ही न्याय चाहता है। शायद यही सच्चा न्याय है। लेकिन कानून की किताब में इसे हत्या माना जाएगा। अतुल ने आत्महत्या की, लेकिन समाज जानता है कि यह आत्महत्या नहीं, बल्कि एक हत्या थी।
न्यायपालिका के हाथ कानून से बंधे हो सकते हैं। लेकिन जो पेशकार जज के नीचे बैठकर पैसे लेता है, या जो जज खुले तौर पर रिश्वत मांगती है, उसे अगर कोई राह चलते गोली मार दे, तो वह अन्याय नहीं होगा। क्योंकि उसने केवल रिश्वत नहीं मांगी, बल्कि उस व्यक्ति की हत्या में भी योगदान दिया।
कुछ लोग कह रहे हैं कि अतुल को जज को पैसे देकर मामला सुलझा लेना चाहिए था। लेकिन ऐसा कहना आसान है। हर व्यक्ति अपने आदर्शों से समझौता नहीं कर सकता। पेशकार को 100 रुपए देना भी घूस है, और उससे न्याय की उम्मीद करना बेकार है।
तलाक एक पूर्ण विकसित उद्योग है। देखें, तलाक से किन-किन को लाभ होता है:
- जीवनसाथी
- वकील
- जज
- मध्यस्थ/सुलहकर्ता (समझौते के लिए नियुक्त)
- नोटरी और दस्तावेज तैयार करने वाले
- कोर्ट क्लर्क (“फीस” के रूप में तेज़ केस प्रोसेसिंग और दस्तावेज़ तक पहुँच के लिए)
- जज के कर्मचारी (टाइपिस्ट, चपरासी, सहायक, मुंशी, आदेशवाहक, ड्राइवर)
- पुलिस
- काउंसलर और थेरेपिस्ट
- फोरेंसिक विशेषज्ञ
- अकाउंटेंट (फोरेंसिक ऑडिट के लिए, संपत्ति, आय, या छुपाई गई संपत्ति का पता लगाने में)
- संपत्ति छुपाने वाले नेटवर्क (ऐसे पेशेवर जो एक साथी के लिए संपत्ति छुपाने या निकालने में मदद करते हैं)
- ऋण प्रदाता
- रियल एस्टेट क्षेत्र (संयुक्त रूप से स्वामित्व वाली संपत्तियों की बिक्री या निपटान राशि से नई संपत्ति खरीदने पर होने वाले लेन-देन)
- गैर-सरकारी संगठन (NGOs) और कार्यकर्ता
- झूठे गवाह
- मकान मालिक
- पैकर और मूवर्स
- निजी/सरकारी परिवहन और होटल उद्योग (अदालत की तारीखों के लिए यात्रा और ठहराव के लिए)
अमेरिका में तलाक उद्योग का मूल्यांकन हॉलीवुड से भी बड़ा माना जाता है। भारत भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है।
मैं तलाक के खिलाफ नहीं हूं। एक जहरीले रिश्ते में पूरी जिंदगी बिताने की बजाय अलग हो जाना बेहतर है।
मेरा तर्क उन अत्यधिक पक्षपाती कानूनों और बेतहाशा भ्रष्टाचार के खिलाफ है, जिसने तलाक को एक सुव्यवस्थित मशीनरी में बदल दिया है, जिससे कई हितधारकों को लाभ होता है।
अतुल की आत्महत्या को भगत सिंह के स्तर का नहीं कहा जा सकता, लेकिन उनकी सोच कहीं न कहीं वैसी ही थी। उन्हें लगा कि उनकी मौत से समाज में बदलाव आएगा। उन्होंने महसूस किया कि पूरा सिस्टम न केवल उन्हें, बल्कि उनके पूरे परिवार को निशाना बना रहा है।
हम अपने लिए उतनी चिंता नहीं करते, जितनी अपने माता-पिता, पत्नी या बच्चों के लिए करते हैं। अतुल ने भी यही सोचा। उन्हें लगा कि उनके हट जाने से बाकी लोगों की जिंदगी बेहतर हो जाएगी।
अतुल की आत्महत्या एक समझौता है। यह समझौता उन्होंने अपने परिवार की भलाई के लिए किया। उन्हें यह भी विश्वास था कि उनका बेटा बड़ा होकर शायद उनके दर्द और निर्णय को समझ पाए।
यही सच्चाई है। और यही हमारी सबसे बड़ी विडंबना।



