भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की गाथा कई नायकों और घटनाओं से भरी पड़ी है। परंतु कुछ ऐसे भी योद्धा थे जिन्होंने न केवल राजनीति में बल्कि न्यायिक व्यवस्था और संवैधानिक स्तर पर ब्रिटिश साम्राज्य को खुली चुनौती दी। ऐसे ही एक महान शख्सियत थे सर चेरियनकुन्नथ शंकरन नायर (Sir C. Sankaran Nair)।
वे एक प्रसिद्ध वकील, समाज सुधारक और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रभावशाली स्तंभों में से एक थे। जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद जिस तरह उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आवाज उठाई और कानूनी लड़ाई लड़ी, वह भारतीय इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है।
1907 में वे इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष बने, जब कांग्रेस दो हिस्सों में बंटी हुई थी – गरम दल और नरम दल। शंकरन नायर उन नेताओं में से थे जिन्होंने गरम दल का समर्थन किया और स्वराज की मांग को ज़ोरदार तरीके से उठाया।
वे मानते थे कि केवल सामाजिक सुधारों से भारत को स्वतंत्रता नहीं मिलेगी, इसके लिए ब्रिटिश राज के खिलाफ सीधी और सशक्त टक्कर ज़रूरी है।
1919 का साल भारत के इतिहास में एक काले धब्बे के रूप में दर्ज है। पंजाब के अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के पर्व पर एक शांतिपूर्ण सभा पर जनरल डायर के नेतृत्व में गोलियां बरसाई गईं।
जलियांवाला बाग नरसंहार में सैकड़ों निर्दोष लोगों की हत्या कर दी गई। इस अमानवीय घटना ने पूरे भारत को झकझोर कर रख दिया।
हालांकि ब्रिटिश सरकार ने जनरल डायर का बचाव किया और किसी तरह की सज़ा नहीं दी, जिससे भारतीयों के बीच आक्रोश और अधिक बढ़ गया।
इसी घटना के विरोध में सर सी. शंकरन नायर ने वायसराय की कार्यकारी परिषद (Executive Council) से इस्तीफा दे दिया।
यह उस समय का बहुत बड़ा कदम था क्योंकि परिषद में भारतीयों को बहुत सीमित संख्या में प्रतिनिधित्व मिलता था। उनका इस्तीफा सीधे तौर पर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सार्वजनिक विरोध का प्रतीक बना और इससे उनकी प्रतिष्ठा और लोकप्रियता दोनों में इज़ाफा हुआ।
लेकिन यह यहीं नहीं रुका। जब ब्रिटिश सरकार ने जलियांवाला बाग नरसंहार की जांच के लिए हंटर कमेटी बनाई, उसमें जनरल डायर को निर्दोष घोषित कर दिया गया।
इससे आहत होकर सर शंकरन नायर ने अपनी आत्मकथा “गांधी एंड अनरेस्ट एंड THE STORY OF MY LIFE” में ब्रिटिश सरकार की नीति, पंजाब में हुई बर्बरता और जनरल डायर की भूमिका की तीव्र आलोचना की। उनकी यह किताब अंग्रेजों को बिल्कुल रास नहीं आई।
जनरल डायर और ब्रिटिश सरकार ने नायर साहब पर मानहानि (Defamation) का मुकदमा ठोक दिया, जिसे ब्रिटिश इतिहास में “Sir Michael O’Dwyer v. Sir C. Sankaran Nair” के नाम से जाना जाता है।
ओ’ड्वायर, जो उस समय पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर थे और जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए नीति-निर्धारकों में से एक माने जाते हैं, उन्होंने इस मुकदमे के ज़रिए नायर को चुप कराने की कोशिश की।
लेकिन नायर ने इस मुकदमे को भी एक मौका समझा – ब्रिटिश अत्याचारों को अंतरराष्ट्रीय पटल पर लाने का।
यह मुकदमा ब्रिटिश अदालत में 1924 में लड़ा गया और इसका असर केवल कानूनी स्तर पर ही नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टिकोण से भी पड़ा।
नायर ने अदालत में ऐसे साक्ष्य प्रस्तुत किए जिन्होंने ब्रिटिश शासन की नृशंसता को सबके सामने लाकर रख दिया। उन्होंने बताया कि कैसे शांतिपूर्ण सभा में लोगों पर बिना चेतावनी के गोलियां चलाई गईं, कैसे शवों को हटाने नहीं दिया गया, कैसे ज़ख्मी लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया गया।
भले ही मुकदमे का फैसला ओ’ड्वायर के पक्ष में गया, लेकिन नैतिक जीत नायर की थी। ब्रिटिश अखबारों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक इस केस की चर्चा हुई।
इससे भारत में राष्ट्रीय आंदोलन को नई ऊर्जा मिली और अंग्रेजों के दोहरे चरित्र का पर्दाफाश हुआ। नायर की निर्भीकता और सच्चाई के लिए प्रतिबद्धता ने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रेरणास्रोत बना दिया।
सर शंकरन नायर ने अपने पूरे जीवन में सत्य और न्याय की रक्षा की। वे यह भलीभांति जानते थे कि स्वतंत्रता केवल तलवार और बंदूक से नहीं बल्कि विचार, तर्क और सत्य की शक्ति से भी प्राप्त की जा सकती है।
उन्होंने न केवल ब्रिटिश हुकूमत की आलोचना की, बल्कि भारतीयों को यह विश्वास भी दिलाया कि एक पढ़ा-लिखा और जागरूक भारतीय अगर सही मंच पर बोले तो साम्राज्य की चूलें हिल सकती हैं।
उनकी यह विरासत आज भी हमें प्रेरित करती है कि अन्याय के विरुद्ध कभी भी चुप न रहें – चाहे वो सत्ता कितनी भी बड़ी क्यों न हो।



