घाट-घाट की छटा निराली है।
संगम का दृश्य विहंगम है।
घाट-घाट की छटा निराली है।
दिव्य ज्ञान की गंगा यहाँ प्रवाहित,
उत्सव की चहुँ ओर लाली है।
महाकुम्भ का ऐसा लगता पर्व,
जैसे दिन में होली, रात दिवाली है।
घाट-घाट की छटा…
ऐसे सजे अखाड़े तम्बू गाड़े,
हर वस्तु यहाँ आभा वाली है।
अम्बर से उतरे हों जैसे भू पर भूप,
लगता देवलोक हो गया खाली है।
घाट-घाट की छटा…
अगणित विभूतियाँ यहाँ पधारीं,
लगता सारे लोक हो गए खाली हैं।
अदभुत यहाँ नजारे दिखते,
जहाँ कहीं भी नजरें डाली हैं।
घाट-घाट की छटा…
अपनी-अपनी मस्ती में मशगूल,
सन्त-महन्त यहाँ न कोई खाली है।
सुख-दुःख का संगम संसार में,
संगम की मस्ती मतवाली है।
घाट-घाट की छटा…
जीवन-सागर भी एक महाकुम्भ है,
मंथन से पीयूष पाने वाले भाग्यशाली हैं।
विष पीकर भी जो अमर हो रहे,
उनकी जय-जय युग-युग होने वाली है।
घाट-घाट की छटा…
लेखक
श्री विनय शंकर दीक्षित
“आशु”
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