|| बुराई ||

बुराई

बुराई संग बुराई कर, भलाई को कहाँ रख दूँ।
बसी इंसानियत दिल मे, लडाई हो कहाँ रख दूँ।।
मकसदे-जिन्दगी के छोड क्यों भटकू मला यारो,
अगर फिसला तो फिसलन मे, हँसाई जो कहाँ रख दूँ।।

जिन्हें सत् मार्ग दिखलाया, बदल अपनी राहे डाली ।
हमारे हर ठिकानों को, स्वंय ही कर गये खाली ।।
सताया जब जमाने ने बडे टूटे हुये दिल से,
हमारे पास आ, दुखडा सुना, आँखें ही भिगो डाली ।।

कभी वो पास आते भी नही है ।
बात दिल की, बताते भी नही है ।।
शर्म सारे जहाँ की वो समेटे,
नजर अब वो, मिलाते भी नही है ।।

लेखक
राकेश तिवारी
“राही”

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